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Wednesday, May 9, 2012

श्री ५ नवतनपुरी धाम, जामनगर (गुजरात)



पहले बीज उदे हुआ, पुरी जहा नौतन ।
सब पुरीयो में उत्तम, हुई जो धन धन ॥

अनुप शहर मे अवतरित प्रकाश हिन्दुस्तानी ग्रन्थ मे महामति श्री प्राणनाथजी ने उक्त चौपाई के द्वा्रा श्री क्रिष्ण प्रणामी धर्म मे श्री ५ नवतनपुरी धाम का महत्व प्रकट किया है। तब से श्री क्रिष्ण प्रणामी धर्म के इतिहास मे नवतनपुरी की महिमा पावनकारी पुरी के रुप मे शोभायमान रही है। क्योंकि नवतनपुरी मे ही निजानंद संप्रदाय का प्रादुर्भाव हुआ है। तारतम मंत्र तारतम सागर - श्री मुखवाणी - अवतरण का प्रारम्भ भी यही पर हुआ और इसी पुरी मे ही सदगुरु श्री देवचन्द्रजी ने जागनी महायज्ञ का प्रारम्भ किया, जो महामति श्री प्राणनाथजी के द्वारा देश - विदेशो मे फैला।

आमतौर पर तीर्थ भूमी के तीन लक्षण माने जाते है:-

१ जिस भूमी पर किसी महापुरुष का जन्म हुआ हो ।

२ महापुरुषो की कर्म भूमी हो, और

३ महापुरुषो की निर्वाण भूमी हो ।

नवतनपुरी धाम मे ये तीनो लक्षण विधमान है। यह पावन पुरी महामति श्री प्राणनाथजी की प्राकट्य भूमि है। आधसंस्थापक सदगुरु श्री देवचंद्रजी और महान प्रवर्तक महामति श्री जी की लीला भूमि है, और सदगुरु महाराज का धामगमन भी इसी पुण्यभूमि मे हुआ था। अत: श्री ५ नवतनपुरी धाम की अनन्त महिमा का नवतन वर्णन श्री कुलजम स्वरुप और बीतक ग्रन्थो मे मिल जाता है। जैसे :-

नौतनपुरी मां ए निध, सारी सनंधें गोताणी ।
निरखी गोतीने नेह करी, सहु मां संभलाणी ॥

धन धन पुरी नौतन, जे मां ए लीला थई ।
लीला बंने पाधरी, रास प्रकासे कही ॥ प्र.गु. ३१/१३-११२

श्री ५ पदमावतीपुरी धाम पन्ना मे अवतरीत श्री परीक्रमा ग्रन्थ मे श्री बुद्धजी की असीम महिमा का गोपनीय रहस्य मंगलाचरण मे बयान कराते हुये कहा गया है कि -

एते दिन त्रिलोक में हुती बुद्ध सुपन ।
सो बुद्धजी बुध जाग्रुत ले, प्रगते पुरी नौतन ॥ परि. प्र. २/१०

जागनी ब्रह्मांड की इन अनन्त लीलाओ को प्रत्यक्ष दर्शन करके स्वामी श्री लालदासजी ने श्री बीतक साहेब मे अनुपम वर्णन किया है। वे महामति जी के प्रदुर्भाव प्रसंग का वर्णन करते हुये श्री बीतक मे कहते है :-

हालार देश पुरी नौतन, उदर बाई धन ।
केशव ठाकुर पिता कहियत, तहा श्री राज प्रगटन ॥

इस तरह श्री ५ नवतनपुरी धाम का श्री क्रिष्ण प्रणामी धर्म परमपावन, अनन्य, नित्य, अखण्ड माहात्म्य का है।

प्रेम प्रणाम धर्म परायण सुंदरसाथजी ................
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Tuesday, May 8, 2012

Shree Raas Granth

JOGMAYA NO DEH DHARNI, SHREE SHYAMAJI THAYA TAIYAR l
TATKHIN TANHA TENE THAME, MARE SATHE KIDHO SINGAAR ll 1 (RAAS P - 7)

(shyamsundar shree krishna ne brahmaatmaao (gopiyo) ke sath raas leela karne ke lie yogmaya ke mandal ki rachna ki jisme) yogmaya ke srungaarpurn deh dharan kar shree shyamaji raas leela ke lie taiyar ho gai. Usi samay usi sthan par hum sakhiyo ne bhi milkar yogmaya ka alaukik srungaar dharan kiya.
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RAS BHAR RANG VALAJISU RAMAVA, UCHHARANG ANG NA MAAY l
INDRAVATI BAI KAHE DHAMNA SATHNE, HU NAMI NAMI LAGU PAAY ll 12 (RAAS P – 7)

Priyatam shree krishna ke sath raspurvak raman karne ki icha ke karan sabhi ke mann me anand aur ullas samata nahi tha. Indravati sakhi kahati hai ki paramdham ke in brahmatmao ke charno me me jhuk jhuk kar vinamrta purvak pranam kariti hu.
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NAVAL VESH LYAVYA EK BHANTNO, KASVATIE VANSLI LAL l
ADHUR DHARINE JYARE VEN VAGADE, TYARE CHITADA HARE TATKAL ll 46

Priyatam shree krishna ne aaj navin vesh dharan kiya he. Unki kamar par bandhi hui pichouri me lal vanshi latkai hui he. Jab ve vansi ko hotho se lagakar bajane lagte he to turant hi hamare chit ko har lete he.
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EH SARUP NE EH VRUNDAVAN, E JAMUNA TRAT SAAR l
GHAR THI TIT BRAHMAND ALAGO, TE TARTAME KIDHO NIRDHAR ll 36 P-10

Shyamsundar shree krishna aur sakhiyo ka yah divya svarup, yah akhand vrundavan tatha yamunaji ka tat ramaniy he. Yogmaya dvara rachit yah mandal ka sthan (akhand vrundavan) paramdham se is aur tatha kalmaya ke brahmand se bhinn (keval brahm ki svamini me) he. Iska spashtikaran nischit rup se tartam gyan dvara hi hua he.
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VRUNDAVAN TO JUGATE JOYU, SYAM SYAMAJI SATH l
RAMAT KARSU NAV NAVI, KANII RAND BHAR RAMASU RAAS ll 2 P-11

He sakhi ! humne shyam aur shyamaji ke sath samast vrundavan ki shobha bhalibhanti dekh li. Ab hum vibhinn prakar ki ramate karengi aur hraday me ullas bharkar raas khelengi.
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श्री क्रिष्ण महामंत्र " निजनाम "

जिन गोकुलको  तुम अखंड कहत हो, सो तुमारी द्रष्टें न आया ।
सुकजी के वचन में प्रगट लिखा है, पर तुमको किने न बताया ॥ (किरंतन १० / २)

जिस गोकुल लीलाको तुम अखंड कहते हो और उसे इस बूमण्डल मे ही दिखाते हो, तुम्हारी द्रुष्टि (समझ) मे नही आई है। शुकदेवजी ने श्री मदभागवत मे स्पष्ट कहा है किन्तु आज तक तुम्हें किसीने नही समझाया है।


कौन तुम और कहां तें आए, और कहां है तुमारा घर ।
ए कौन भोम कहां श्री क्रिष्ण जी, पाओगे कौन तर ॥ (किरंतन १२ / ५)

परन्तु तुम कौन हो, इस संसार में कहां से आए हो, तुम्हारा मूल घर कहां है, यह संसार क्या है, श्री क्रिष्णजी कहां है और उन्हें किस प्रकार प्राप्त कर सकोगे? इन प्रश्नो पर विचार तो करो।


आज सांच केहेना सो तो काहूं ना रुचे, तो भी कछुक प्रकासूं सत ।
सतके  साथीको   सतके   वान  चूभसी,  दुष्ट  दुखासी   दुरमत ।
                                                     अखंड सुख लागियो ॥ १    

आज के युद में परिस्थिति एसी हो गई है कि सत्य बात कहे जाने पर किसीको सुहाती नही, तथापि कुछ सत्य बाते में कहूंगा। सत्य के साथी ब्रह्मस्रुष्टिको तो यह सत्य भाएगा, परन्तु इसके विपरित चलने वालोंको अवश्य ठेस पहुंचेगी। चलो, अखंड सुख की ओर बढें।

         
 वेदने पुरान सास्त्र सब उपजे, पीछे भारत परव अठार ।
दाझ न  मिटी तिन व्यासकी, पीछे उदयो भागवत सार ॥ २

वेद व्यासजी ने चारो वेदो का वर्गीकरण किया और कथानक शैली द्वारा उनका अर्थ समझाने के लिए पुराणो की रचना की। अन्त मे अठारह पर्व वाले महाभारत की रचना की, तथापि उनकी दाह शान्त नही हुई और अन्त मे नारदमुनिकी प्रेरणासे सबके साररुप श्री मदभागवत की रचना की।
 

इत व्रुन्दावन रासलीला रातडी अखंड, खेले पींउ गोपी जन ।
तो उधव संदेसे किन पर ल्याइया, कहो किनने किए रुदन ॥ ६

वल्लभाचार्यजी ने स्पष्ट कहा है कि व्रुन्दावन मे महारात्रि मे अखण्ड रासलीला चल रही है, श्री क्रिष्ण जी गोपियों के साथ रास खेल रहे है। अब तुम बताओ कि उद्धवजी श्री क्रिष्णजी का सन्देश लेकर किन गोपियो के पास गए ? किन्होने श्री क्रिष्णजी के वियोगमे रुदन किया ? (रास लीला अखण्ड होनेसे मूल गोपिया तो रास खेल रही है फिर वे गोपिया कौन है, जिनके पास उद्धवजी सन्देश लेकर गए है)


व्रज रास लीला दोऊ नित कही, खेले दोऊ लीला बाल किसोर ।
तो मथुरा आए कंस किनने मारया, ए कौन भई तीसरी लीला और ॥ ११

व्रज और रास दोनो लीलाओको अखण्ड कहा है। व्रज मे श्री क्रिष्ण जी के बाल स्वरुप की लीला है। जब कि रास मे उन्होने किशोर लीला की है। तो प्रश्न यह उपस्थित होता है कि बाल और किशोर क्रिष्ण दोनो व्रज और रास मे नित्य लीला कर रहे है, तो फिर मथुरा जाकर कंसको किसने मारा ? यह तीसरी लीला कौन सी है ?


तुम आंकडी न  पाई इत अखंड कह्या, तो ए न खुले रे द्वार ।
तुम समझे नही वानी सुकदेव की, तो हिरदे रह्यो रे अंधकार ॥ १३

तुम यह रहस्य समझ ही नही पाए हो कि व्रज और रास की लीलाको क्यों अखण्ड कहा है ? तुम्हारे मनके द्वार अभी तक नही खुले है। क्योंकि तुमने शुकदेवजीकी वाणी (भागवत) को यथार्थ रुप से समझा नही है, इसीलिए तुम्हारे ह्रदय मे अज्ञान का अन्धकार छाया हुआ है।
(किरंतन प्रकरण १३)


वैस्नवो मोह थकी निध न्यारी दीधी, आपणने अविनास ।
नाम तत्व कह्यु श्रीक्रिष्णजी, जे रमे अखंड लीला रास ॥ ७ ॥ किरंतन प्र – ६४

हे वैष्णवो ! वल्लभाचार्यजी ने हमे इस मोहसागर से परेका अखंड अविनाशी धन (ज्ञान) दिया और कहा कि श्री क्रिष्ण नाम ही परम तत्व है, जो श्री क्रिष्णजी अखंड रास की लीला करते है।
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Sunday, May 6, 2012

श्री क्रिष्ण महामंत्र "निजनाम"

श्री सागर

श्री क्रिष्ण लीला की दूसरी साक्षी लेकर शुकदेव मुनि अवतरित हुये। उन्होंने परमधाम से सर्वप्रथम ब्रज मंडल में अवतरित हुई ब्रह्मात्माओ की ग्वाही दी है :-

फुरमान ल्याया दूसरा, जाको सुकजी नाम ।
दै तारतम गवाही ब्रह्मस्रुष्टि की, जो उतरी अब्बल से धाम ॥ (८/५)

परमधाम के आत्म – सम्बंध की पहचान करवाने के लिए पूर्णब्रह्म श्री क्रिष्ण जी ने इस जगत मे ब्रज और रास की दिव्य लीलाए की। इस प्रकार अपनी संबंधी ब्रह्मात्माओ को अपार सुख प्रदान करने के लिए ही वे स्वयं इस महीमामयी रात्रि (ब्रज, रास और जागनी) मे तीन बार आए है:-
सर्व प्रथम उन्होंने ब्रज लीला मे अपनी आत्माओ को परमधाम के प्रेम का अनुभव कराता और दूसरी बार रास की लीला मे भजनानंद लीला के द्वारा चिन्मय प्रेम के परम गोपनीय गूढ सहस्यो को स्पष्ट किया :-

हकें निसबत वास्ते, कै बंध माहें खेल ।
सब सुख देने निसबत को, तीन बेर आए माहें लैल ॥
अब्बल देखाया लैल मे, निसबत जान इसक ।
दूसरी बेर दे्खाइया, गुझ इसक मुतलक ॥ (सागर १४/७, ८)

अखंड परमधाम मे धामधनी की ब्रह्मांगनाओ का स्नेह एसा है की उनका चित्त प्रेम और आनंद से सदा परिपूर्ण है – जिसका वर्णन इस अनित्य देह की जिह्वा से कदापि नही हो सकता है :-

इन धाम के जो धनी, तिन अंगो का सनेह ।
हेत चित आनंद इनका, क्यों कहू जुबा इन देह ॥ (सागर ११/३२)

श्री राजजी महाराज अपने ह्रदय मे स्थित जिस दिव्य प्रेम के गूढ रहस्य को मूल मिलावा मे बैठ कर प्रकट किया था–उसी मूल मिलावा के प्रेम को अपने ह्रदय मे धारण कर ब्रह्मात्माए ब्रज और रास के ब्रह्मांड मे अवतरित हुई थी और परमधाम का अमुल्य उपहार स्वरुप उस प्रेम को प्रकट किया है :-

इसक गुझ दिल हक का, सो करे जाहेर माहें खिलवत ।
सो खिलवत ल्याए इत आसिक, करी इसकें जाहेर न्यामत ॥ (१२/१९)

ब्रह्मात्माए तथा ईश्वर स्रुष्टि ब्रज और रास की इस महिमामयी ‘’लैल तुल कद्र'’ की रात्रि मे किस लिए अवतरित हुई तथा ‘’ कुन – हो जा'’ एसा कह कर यह सम्पूर्ण स्रुष्टि किसने तथा किस लिए उतपन्न की, यह सुधि किसीको भी नही है । सो इस प्रेम के रहस्य को ‘निजनाम' महामंत्र रुपी कुंजी – तारतम ज्ञान ने सम्पूर्ण विवरण सहित प्रकट किया जिससे सारे सन्देह समाप्त हो गये कि इस महिमामयी रात्रि मे ब्रह्मात्माए मूल मिलावा के प्रेम को लेकर तीनो ब्रह्मांडो ब्रज, रास और जागनी मे अवतरित हुई :-

गिरो रुहें फिरस्ते लैल में, किन वास्ते आए उतर ।
कुंन केहेते खेल पैदा किया, ए किन ने किन खातर ॥
ए बल देखो कुंजीय का, जिन बेवरा किया बेसक ।
ए भी बेवरा देखाइया, जो गैब खिलवत का इसका ॥ (१३/१९, ३१)
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प्रेम प्रणाम सुंदरसाथजी..................
 

Friday, May 4, 2012

श्री क्रिष्ण महामंत्र " निजनाम "

श्री परिक्रमा 
श्री महामति जी कहते कि परमधाम के अन्दर मूल मिलावा की बारह हजार ब्रह्मात्माए वहा बैठे बैठे इस महामहिमामयी रात्रि (लैलतुलकद्र) के तीन खण्डो - ब्रज, रास और जागनी को देखने के लिए अपने प्रियतम अनादि अक्षरातीत श्री क्रिष्ण के साथ सुरता रूप में उतरी है:-

अब देखो अन्दर के, रुहें बैठी बारे हजार ।
उतरी लैलत कदर में, खेल देखन तीन तकरार ॥ (परिक्रमा ३३/१)
गिरो उतरी लैलत कदर में, कह्या तिनमें का है तूं ।
खोल दे पट अरस का, ज्यों आए मिले तुझकों ॥ (परिक्रमा  ३२/८)

ब्रज और रास के मंडल में ब्रह्मात्माए ही परमधाम के दिव्य प्रेम को लेकर इस जगत मे अपने पियतम श्री क्रिष्ण के साथ अवतीर्ण हुई है इन्होने ही जगत में परमधाम के प्रेम को ब्रज और रास लीला के खेल मे प्रकट किया अन्यथा इस संसार मे अभी तक कही भी परमधाम कि चिन्मय प्रेम लीला नही थी:-

प्रेम नाम दुनिया मिने, ब्रह्म स्रुष्टि ल्याई इत ।
ए प्रेम इनो जाहेर किया, ना तो प्रेम दुनी मे कित ॥
सुक व्यास कहे भागवत मे, प्रेम ना त्रिगुन पास । 
प्रेम बसत ब्रह्म स्रुष्ट मे, जो खेले सरुप ब्रज रास ॥ (परिक्रमा ३९/२,४)

अर्थात वेदव्यासजी और शुकदेव मुनि ने श्री मदभागवत मे स्पष्ट कहा है कि वह परमधाम का दिव्य प्रेम त्रिगुन स्वरुप - ब्रह्मा, विष्णु और महेश मे भी नही है । परमधाम का यह दिव्य प्रेम तो उन ब्रह्मस्रुष्टियो के ह्रद्य मे ही अन्तर्निहित है जिन्होने अपने प्रियतम श्री क्रिष्ण के साथ ब्रज और रास की ब्रह्म लीलाए की है । यही कारण है कि परमधाम के इस चिन्मय प्रेम को नवधाप्रकार की भक्ति से सर्वश्रेष्ठ कहा गया है - क्योंकि चौदह लोको के इस ब्रह्मांड मे भी वह दिव्य प्रेम प्राप्त नही है, जो गोपियो के पवित्र ह्रदय मे नित्य विधमान है। अतएव ब्रज और रास की प्रेममयी लीलाओ मे अवतरीत एसे प्रेम की सहज एवं स्वाभाविक आत्मानुभूति ब्रह्मात्माओ के अतिरिक्त अन्यत्र कैसे प्राप्त हो सकती है?

तो नवधा से न्यारा कह्या, चौदे भवन मे नाही । 
सो प्रेम कहा से पाइए, जो रेहेत गोपिका माहि ॥ (परिक्रमा ३९/५)
तीन ब्रह्मांड जो अब रचे, ब्रह्म स्रुष्ट के कारन ।
आप आए तिन वास्ते, सखी पूरे मनोरथ तिन ॥ (परिक्रमा २/१६)

धाम धनी अनादि अक्षरातीत श्री क्रिष्ण जी ने अपनी ब्रह्मांगनाओ के लिए ब्रज, रास और जागनी इन तीन ब्रह्मांडो की रचना करवाई एवं स्वयं श्री क्रिष्ण के स्वरुप मे प्रकट होकर ब्रह्मात्माओ के मनोरथ ब्रज, रास और जागनी के ब्रह्मांडो मे पुर्ण किए ।

प्रेम प्रणामजी सुंदरसाथजी 





 

श्री क्रिष्ण महामंत्र " निजनाम "

श्री खिलवत 
तारतम ज्ञान के माध्यम से श्री महामति जी ने कहा कि परमधाम में परब्रह्म श्री क्रिष्ण जी, श्यामाजी और ब्रह्मात्माओ में परस्पर प्रेम को लेकर विवाद सर्वदा होता रहता था - 

दायम रबद होत है, रुहें हादी हक ।
सब कोई कहे अपना, बडा है इसक ॥ 
एक समें हक हादी रुहें, मिल किया मजकूर ।
रब्द किया इस्क का, सबों आप अपना जहूर ॥ ( खिलवत १६/७)

 तब श्री राजजी ने सभी ब्रह्मात्माओ को बताया कि मैं तुम्हारा और बडी रुह श्यामाजी का भी प्रेमी अर्थात आशिक हू।  मेरे अखंड परमधाम कि पातशाही और महिमा का तुम्हें पता नही है । इसीलिए तो तुम सबको अपना - अपना प्रेम बडा दिखायी दे रहा है । 

परमधाम का प्रभुत्व और एक दिली का प्रेमभाव ब्रह्मात्माओ को देखाने के लिए सर्वप्रथम अनादि अक्षरातीत श्री क्रिष्ण ने अपने मन में लिया :-
एक पातसाही अरस की, और वाहेदत का इसक ।
सो देखलावने रुहन को, पेहेले दिल मे लिया हक ॥ (खिलवत १६/१७)

तब परवरदिगार श्री राज जी ने अपने अंगनाओ को जगत की मायामयी अपरा लीला दिखाने के लिए सर्वप्रथम ब्रजमंडल में और दूसरी बार योगमाया के ब्रहमांड ' रास मंड्ल ' में भेजकर परमधाम के अनन्त अखंड सुख प्रदान किये । तीसरे खंड - जागनी के ब्रहमांड में फज्र  - अरुणोदय (जागनी रास) का अनन्त सुख प्रदान किया:-
कई सुख दिये लैलत कदर में, जो अब्वल दो तक्कार ।
सुख दिए फजर तीसरे, कई सुख परवरदिगार ॥ (खिलवत ८/२०)

न्यामत ल्याए सब रात में, लैलत कदर के माहें ।
बुलाए ल्याओ रुहें फजर को, वतन कायम है जाहें ॥ (खिलवत ६/६)

इस प्रकार श्रीजी महाराज कहते हैं कि नि:संदेह परमधाम से ब्रह्मात्मायें अपने प्रियतम श्री क्रिष्ण के साथ इस जगत में तीन बार (ब्रज, रास और जागनी के तीनो ब्रह्मांडो में) अवतरित हुई है:-
सक ना अरवाहें अरस की, जो तीन बेर उतरे ।
लैल में आये जिन वास्ते, कछू सक ना रही ए ॥ (खिलवत ६/२५)

प्रणामजी सभी सुंदरसाथजी को
 

Thursday, May 3, 2012

श्री क्रिष्ण महामंत्र ' निजनाम '

श्री खुलासा
परमधाम से अवतरीत अनादि अक्षरातीत श्री क्रिष्ण कि दिव्य ली्लाओ के परम गोपनिय रहस्य जो कुरान और पुराण दोनों में सांकेतिक भाषा में छिपे हुये थे उनमें निहित श्री क्रिष्ण कि लीला के रहस्य को स्पष्ट करने के लिए इस कलियुग के अन्तिम चरण में ‘ निजनाम " का अवतरण हुआ :-

इनमें फुरमान ल्याया रसूल , देने अपनी खबर आप ।
फुरमान कोई ना खोल सके, जाथें होए हक मिलाप ॥
फुरमान एक दुसरा, सुकजी ल्याए भागवत ।
ए खोल सके ना त्रैगुन, यामें हमारी हकीकत ॥ (खुलासा ८/९ – १०)

खुलासा ग्रन्थ के प्रकरण १३ में भागवत और कुरान के कथान को में श्री क्रिष्ण लीला के रहस्यो को इस प्रकार खोला गया है :-
कंसे काला ग्रुह में, किए वसुदेव देवकी बंध ।
भानेज मारे आपने, एसा राज मद अंध ॥
नूह काफर के बंध में, रहे साल चालीस ।
बेते मारे कै दुख दिए, तो भी काफरे न छोडी रीस ॥
कहे वेद बैकुंथ से, आए चतुर्भुज दिया दीदार ।
वसुदेव तिन सिखापन, स्याम पोहोंचाया नंद द्वार ॥ (खुलासा १३/१ – ३)
खेल हुआ जो लैल में, तकरार जो अब्बल ।
उतरी रुहे फिरस्ते, अरस के असल ॥
सात रात आठ दिन का, सुके कह्या इंद्रकोप ।
भेजी वाये जल अगनी, प्रले को म्रुत लोक ॥
सात रात आठ दिन का, हुआ तोफान हूद मेहतर ।
राखी रुहे कोहतूर तले, और डूब मुए काफर ॥
हूद कह्या नंद जीय को, टापू ब्रज अखंड ।
कोहतूर गोवरधन कह्या, न्यारा जो ब्रह्माण्ड ॥
जोमाया की नाव कर, तित सखिया लई बुलाए ।
सो शोभा है अति बडी, जित सुख लीला खेलाए ॥ (खुलासा १३/८, १०-१२)
वेदें कह्या स्याम ब्रज में, आए नंद के घर ।
पीछे आए रास में, इत हुई नहीं फजर ॥
ब्रह्म स्रुष्टि सखियां स्याम संग, खेले ब्रज रास के मांहे ।
ए सुनियो तुम बेवरा, खेल फजर तीसरा इहांए ॥ (१३/१५, २३)
श्री क्रिष्णजी ए ब्रज रास में, पूरे ब्रह्मस्रुष्टि मन काम ।
सोई सरूप ल्याया फुरमान, तब रसूल केहेलाया स्याम ॥ (१३/७५)
मोमन तीनों तकरार में, जाहेर होसी लैलत कदर ।
एक दीन होसी दुनी में, सुख कायम बखत फजर ॥ (१३/४७)
तीन सरुप कहे वेद ने, बाल किसोर बिढापन ।
ब्रज रास प्रभात को, ए बुध जी को रोसन ॥ (१३/६९)

इस प्रकार श्री जी महाराज कहते है कि परमधाम से अवतरीत अनादि अक्षरातीत श्री क्रिष्ण के जिस स्वरुप ने ब्रज और रास लीला ओ में ब्रह्मांगनाओ के सभी मनोरथ पूर्ण किए थे, वही स्याम स्वरुप श्री क्रिष्ण का अरब देश में परब्रह्म परमात्मा का परमधाम संदेश ले आने के कारण रसूल मुहम्मद कहलाए । वेद शास्त्रो में भी बताया गया है कि अक्षर ब्रह्म की जाग्रुत बु्द्धि को लेकर वही श्याम स्वरुप निष्कलंक बुधावतार तारतम ज्ञान के माध्यम से समस्त जगज्जीवो को अखंड मुक्ति प्रदान करेंगे :-

वेद कहे बुध इन पें, और बुध सुपन ।
ए ही सब को जगाए के, देसी मुक्ति त्रैगुन ॥
इन विध लिख्या वेद में, सो आए स्याम बुध जी इत । (१३/३६, ७९)

अतएव वही स्याम स्वरुप श्री क्रिष्ण जी बुधावतात महामति श्री प्राणनाथ जी स्वरुप में प्रकट हुए हैं ।
महंमद श्री क्रिष्ण जी स्याम । (खुलासा १२/५३)

प्रणामजी सब सुंदरसाथजी को



श्री निजानन्द सम्प्रदाय के सिद्धान्त

परब्रह्म अक्षरातीत
को ही अपना इष्ट मानते हैं ।
वह अक्षरातीत युगल स्वरूप, परम
किशोर, अनादि, अविनाशी व
स्वलीला अद्वैत है ।
दिव्य ब्रह्मपुर ही हमारा धाम है ।
धाम धनी अक्षरातीत
की उपासना पतिव्रत साधन से
करते हैं ।
हकी स्वरूप श्री प्राणनाथ
जी की शोभा सुन्दरसाथ (परमहंसों)
व हद-बेहद ब्रह्माण्डों में
सर्वोपरि है ।
अपने पूजा स्थल में श्री प्राणनाथ
जी (परब्रह्म अक्षरातीत)
द्वारा अवतरित
वाणी 'श्री कुलजम स्वरूप'
को उन्ही का वाङमय स्वरूप
मानकर पूजा करते हैं ।
सभी पूजा स्थल वास्तव में ज्ञान
मंदिर हैं, जिनका मूल प्रयोजन
श्री मुख वाणी के पठन-पाठन व
चि��्तन-मनन को प्रोत्साहित
करना है ।
श्री प्राणनाथ जी के वाङमय
स्वरूप के अतिरिक्त
किसी अन्य स्वरूप, व्यक्ति,
मूर्ति, चित्र, समाधि या जड़
वस्तु की पूजा निषेध है ।
निजानन्द सम्प्रदाय के
सभी अनुयायियों (सुन्दरसाथ)
को परमधाम
की आत्मा (ब्रह्मसृष्टि) मानकर
उनकी सेवा करना ।
सभी सुन्दरसाथ समान हैं । उनमें
आध्यात्मिक पद, आयु, जाति,
क्षेत्र, लिंग या आर्थिक
स्थिति का भेद मान्य नहीं है ।
आत्मिक दृष्टिकोण व
आध्यात्मिक
योग्यता को ही प्राथमिकता देना ।
परमधाम की आत्माएँ
जो अभी संसार में ही मग्न हैं, उन
तक
ब्रह्मवाणी को पहुँचाना ही जागनी है
। जागनी सभी सुन्दरसाथ
का नैतिक धर्म व वास्तविक
सेवा है ।
जिस प्रकार दीपक से दीपक
जलाया जाता है, उसी प्रकार कोई
भी सुन्दरसाथ
किसी भी जिज्ञासु
व्यक्ति को प्रबोधित करके
(तारतम देकर) सुन्दरसाथ के समूह में
सम्मिलित कर सकता है ।
किसी भी शारीरिक कर्मकाण्ड
(जप, परिक्रमा, उपवास, भजन-
नृत्य, आदि) पर विश्वास न करके
आत्मिक भाव से ज्ञानार्जन, प्रेम
व चितवनि के मार्ग पर चलना ।
सबसे पूजनीय स्थान श्री ५
पद्मावती पुरी (पन्ना, मध्य प्रदेश)
को माना जाता है ।
धूम्रपान, मांस, मदिरादि नशीले
पदार्थ व तामसी भोजन का सेवन
वर्जित है । विषय-वासना, झूठ व
चोरी से संयम करना आवश्यक है ।
श्री प्राणनाथ जी के आवेश से
अवतरित श्री कुलजम स्वरूप
वाणी व श्री बीतक साहेब पूज्य
ग्रन्थ हैं ।
सभी आयु वर्ग के सुन्दरसाथ एक-
दूसरे को समान मानते हुए परस्पर
अभिवादन में प्रणाम का प्रयोग
करते हैं।
शारीरिक संस्कारों (जन्म,
विवाह, मृत्यु, आदि)
को भी सादी रीति से निभाना ।
कोई विशेष कर्मकाण्ड वर्जित
है।
जो हमारे साथ बुराई करे उसके साथ
भी भलाई करना ।
धर्म के अन्य सामान्य
सिद्धान्तों का पालन ।

Wednesday, May 2, 2012

Ranjana Oli

प्यारा नाम खुदाए का, फेरे तसबी लगाए तान।
रात दिन लहे बंदगी, या दीन मुसलमान।।३०

जो परमात्माके नामको प्रिय मानकर उसमें ही मन लगाकर माला फेरतीं हैं एवं रात-दिन उपासनामें ही मग्न रहतीं हैं, वे ही सच्ची र्धािमक आत्माएँ हैं.
Lovely is the name o......f God, those who contemplate on it and day and night pray that person is true spiritual soul.
प्रकरण २१ सनंध
अब सुनियो ब्रह्मसृष्ट बिचार, जो कोई निज वतनी सिरदार ।
अपने धनी श्री स्यामा स्याम, अपना बासा है निजधाम ।।

Presented 100s of Mahamati Prannath vani to make everyone what the name is! He has clearly written in Prakash one must know the Master well. But some people said Raas Prakash they do not believe. They related the name Krishna with Braj Raas leela only. Tried to provide these non-believers of Raas, Prakash, Kalash granth, proofs from kirantan, Parikrama, Khulasa, Sanandh, Kayamatnama that Moolswaroop is Shyam Shri Krishna but the chaupais does not seem to have any effect. They do not dive into the tartamsagar neither believe in others who dive and give it before them. It is Mahamati Prannath's chaupai even one of it can clear the whole confusion but 100s have not!
Mool vatan is Paramdham!
मूल वतन धनिएं बताइया, जित साथ स्यामाजी स्याम ।
पीठ दई इन घर को, खोया अखंड आराम।।२
सनमंध मेरा तासों किया, जाको निज नेहेचल नाम।
अखंड सुख ऐसा दिया, सो मैं छोडया बिसराम।।३
प्रकरण ९९ श्री किरन्तन

Lots of proofs have been provided but non-believers do not seem to agree. The name of God is very sacred and is not matter of debate.
I worked on it thinking there is confusion as many cannot read and understand swaroop saheb and thus volunteered to give the truth but those who already believe only those accept it and non believers continue their path of confusion. In this endeavor all my efforts so far I have felt has gone in vain and thus I failed.
सिर बदले जो पाइए, महंमद दीन इसलाम।
और क्या चाहिए रूहन को, जो मिले आखर गिरोह स्याम।।२५

सब साहेदी दै जो हदीसों, और अल्ला कलाम ।
सो साहेदी ले पीछा रहे, तिन सिर रसूल न स्याम ।।77
prakaran 1 chhota kayamatnama

The non-believers still do not believe but my faith became deeper. I did not know about this confusion existed before as I was born in Nijanand sampradya- Shri Krishna pranami family and was midst Nijanand Shri Krishna Pranami. This conflict gave me opportunity to understand the vani keeping the confusion of others in my mind and this gave me better understanding. In this regard I am grateful to all the non-believers of Shri Krishna as moolswaroop, giving me an opportunity to grow. Regards and Prem pranam
PANNA PARAMDHAM DEKH, ISHAK AARAM DEKH |

Sundarsathji mastanji kehte he ki panna paramdham dekhiye. Yaha biraje hamare dhaniji ka ishq, prem dekh kar jo aaram jo sukun hamari ruh ko milta he wo dekhiye.

KARKE PARNAM DEKH, SAKAL DUKH BHAGE HE ||

Sundarsathji panna paramdham aakar dhaniji ko parnam karke dekhiye aapke dukh ko dhaniji har lete he. Parnam karte hi dukh bhag jata he.

KEHET MASTAN JISE, LAGI HE ISHAK TAAN |

Sundarsathji mastanji kehte he ki pannadham aakar dhaniji ke darshan karke jo ishak hojata he. Prem ki taan lag jati he dhaniji se. Fir hum sada dhaniji ke hi gun gate rehte he.

RUH DEKHIYE DIDAR, SHREE PRANNATHJI PANNA ME BIRAJE HE ||

Sundarsathji mastanji kehte he pannadham me biraje hamare dhaniji ka didar dekh kar hamari ruh dhanya hojati he. Hamare dhani ki shoba ka didar kar varnan ni kar pate. Qunki svyam anadi aksharatit vijyabhinand nishkalank buddhavtaar MAHAMATI SWAMI SHREE PRANNATHJI YAHA BIRAJE HE.

Bolo prannath pyare ki jay.