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Saturday, June 9, 2012

॥ श्री अरजी छोटी ॥

निसदिन ग्रहीये प्रेमसों, श्री जुगल स्वरुप के चरण ।
निर्मल होना याहीसों, और धाम बरनन ॥
इन विध नर्कसे छुटिये, और उपाय कोई नहीं ।
भजन बिना सब नर्क है, पचि पचि मरिये मांही ॥
एक आतम धनी पहेचानिये, निर्मल एही उपाये ।
श्री महामत कहे समझ धनीके, ग्रहिये सों प्रेमें पाये ॥
श्री महामत कहे महेबुबजी, अब दिजे पट उडाये ।
नैना खोलके अंकभर, दुल्हा लिजे कंठ लगाय ॥
कंठ लगाये कंठसु, किजे हांस विलास ।
वारणे जाय श्री इन्द्रावती, पियाजी राखियों कदमों की पास ॥
सदा सुख दाता श्री धाम धनी, काहा कहुं ए बात ।
श्री महामति जुगल स्वरुप पर, अंगना बल बल जात ॥
गुण अवगुण सबके माफ किये, किये पिछले जौन ।
साहेब सों सनमुख सदा, साधी साचो तौन ॥
अवगुण काढे गुण ग्रहे, हारसें होय जीत ।
साहब सौ सनमुख सदा, ब्रह्म स्रुष्टि ए रीत ॥
ए सुख शब्दातीत के, क्यों कर आवे जुबान ।
बालेंसे बुढापन लगे, मेरे शीरपर खडे सुभान ॥
नजरसें नां काढी मुझे, अवलसें आज दिन ।
क्यों कहुं मेहेर मेहेबुबकी, जो करत उपर मोमिन ॥
क्यों मेहेर मुज पर भई, जो दिलमें थी एति सक ।
में जानी मोज मेहेबुबकी, वह देत आप माफक ॥
कोई देत कसाला तुमको, तुम भला चाहियों तिन ।
सुरत धामकी ना छोडियों, सुरत पीछे फिराईयों जीन ॥
हमतो हाथ हुकम के, हक्के हाथ हुकम ।
इत ह्मारा क्या चले, ज्यों जानो त्यों करो खसम ॥
चाहो तो राजी रखो, या चाहो तो दलगिर ।
या पाक करों हादी पना, या बेठावों मांहे तकसीर ॥
पीयाजी तुम तुमारे गुण ना छोडे, मैं तो बोहोत करी दुष्टाई ।
मैं तो करम किये अती निचे, पर तुम राखी मूल सगाई ॥
श्री धनीजी के गुण की मैं क्यों कहो, इन अवगुण पर एते गुण ।
श्री महामत कहे इन दुल्हें पर, मैं वारी वारी दुलहीन ॥
पीयाजी तुमारी साहेबी, अपनी राखों आप ।
इश्क दिजे मोहें आपनों, मैं तासों करुं मिलाप ॥
तुम दुल्हां मैं दुल्हीन, और ना जानु बात ।
इश्क सों सेवा करुं, सबो अंगो साक्षात ॥
मेरे दिलकी देखीयों, दरदना क्छु इश्क ।
ना सेवा ना बंदगी, ए हमारी बितक ॥
अब हुकम धणीके, सब बीध दै पोहोंचाये ।
चेत सको सो चेतियों, लिजो आतम जगायें ॥
अब दिल दलगीर छोडदो, होत तेरा नुकसान ।
जानतहों गोविन्द भेदा, याके पिठ दीजे आसान ॥
अब भली बुरी दुनिकी, जीन लेवो चित ल्याये ।
सुरत पक्की करों धाम की, पर आतम धणी संग मिलाये ॥
सुख दु:ख डारों आगमें, ए जो जुथी माया के ।
पिंड ना देखों ब्रह्मांड, राखो सुरत धाम धणी जे ॥
अब जो कोई होय ब्रह्म स्रुष्टि की, सो लीजो बचन ए मान ।
अपने पोहोरे जागीये, समैया पोहोंच्या आन ॥
सुता हो, सो जागीयों, जागा बैठा होय ।
बैठा ठाढा होईयों, ठाढा पाऊं भर आगे सोय ॥
युं तैयारी किजीयों, आगे करनी हे दौड ।
सब अंगो इश्क लेयके, निकसों ब्रह्मांड फोड ॥
श्री महामति कहे पिछे न देखीयें, न किसी की परवाहें ।
एक धाम हिरदेमें लेयकें, उदाय दीजीये अरवाय ॥
श्री महामत कहे अरवाहें अर्ससे, जो कोई आई होय उतर ।
सो इन स्वरुप के चरण लेयके, चलिये अपने घर ॥
पिया तुमहों तैसी कीजीयों, मैं अर्ज करुं मेरे पिऊंजी ।
हम जैसी तुम जीन करो, मेरा तलफ तलफ जाय जीवजी ॥
जीवरा तो जीवे नहीं, क्यों मिते दिलकी प्यासजी ।
तुम बिना में किनसों कहों, पिया तुम हो मेरी आसजी ॥
आस बिरानी तो करूं, पिया जो कोई दूसरा होयजी ।
सब बिध पियाजी साम्रथ, दीन रैन जात रोय रोयजी ॥
जन्म अंधजो हम हती, पिया सो तुम देखिते कियेजी ।
जब तुम आप दिखाओगे, तब देखुं नैन नजरजी ॥
ए पुकार पिया सुनके, ढिल करो अब जिनजी ।
खीन खीन खबर जो लिजीयों, मैं अर्ज करुं दुलहीनजी ॥
एती अर्ज मैं तो करुं पिया, बीच पडी अंतरायजी ।
सो अंतराय आडी टालके, गुलहा लीजे कंठ लगायजी ॥
कंठ लगाई कंठसुं, कीजे हांस बीलासजी ।
वारणे जाय श्री इन्द्रावती, पिया राखों कदमों के पासजी ॥
तुम दुलहा मैं दुलहीन, और ना जानु बातजी ।
इश्क सों सेवा करुं, सबो अंगो साक्षातजी ॥
सदा सुख दाता श्री धाम धणी, मैं कहां कहुं इन बातजी ।
श्री महामति जुगल किशोर पर, वारी अंगना बल बल जातजी ॥

प्रणाम सुंदरसाथजी

Friday, June 1, 2012

Sundarsathji Jago........

jin sudh seva ki nahi, na kachu sajhe baat l
so kaahe ko ginave aap sathme, jin sudh na supan sakhyat ll

arthaat: jin logo ko dhaniji ki pahchan evam sevaki sudhi nahi hai, ve gudh rahasyo ko nahi samaj sakte, ese log svayam ko sundarsath me kyo ginate he, jinhe na svapna sansaar ki sudhi he aur na hi sakshat dhamdhani ki pahchan he.

kamar bandhe dekha dekhi, jane ham bhi lage tin laar l
le   kabila    kandh    par,  hanste    chale    nar    naar ll

arthat: ese log dusaro ki dekha dekhi kamar bandh kar taiyar hote he aur maan lete he ki ham bhi brahmsrushti ke marg par chal rahe he. apne kutumb parivar ka bhar kandhe me uthakar sansaarik sukho ko bhogate hue ese nar - nari bhi hanste hue chal rahe he.

e lok raah na pavahi, kyoe na sune pukar l
e chale chinti haar jyo, bandhe unt kataar ll

arthat: ese log satya ka marg grahan nahi kar sakte kyonki ve satya updesh sunate hi nahi. ve to matra chintiyo athava unto ki panktivat ek dusare se bandhe hue chalte he.

in  loko ki me kya kahu, jo jae pade sukh kaal l
jo sath kehelae samil bhae, so bhi kahu nek haal ll

arthat: in logo ki baat me kya karu jo jaanbujkar kaal ke mukh me pad rahe he. parantu jo log svayam ko sundarsath kahala kar sundarsath ke samuh me sammilit hue he. me unki dasha ka bhi thada sa varnan karta hu.

dudh to dekhya nahi, dekhya uper ka fen l
daud kare pade khench me, e yo lage dukh den ll

arthat: jinhone dudh ko dekha hi nahi matra uper ke fen ko hi dekha he arthat jo vastavik rahasya ko samje bina matra bahya aadambar se hi bhramit ho rahe he aur parasparik khinchatan (vaad - vivad) me ho pade he, ve is prakar apne vyavhar se muje dukhi kar rahe he.

na pehechan prakrut ki, na pehchan hukam l
na sudh thaur nehechal ki, na sudh sarup brahm ll

arthat: maya me magna rahne wale logo ki akshar ki ichah shaktirupi prakruti tatha purnbrahm ke aadesh ki pahchan nahi he. unhe apne akhand ghar evam parbrahm parmatma ka bhi gyan nahi he.

sudh nahi nirakar ki, aur sudh nahi sun l
sudh na sarup kaal ki, na sudh bhai niranjan ll

arthat: ese logo ko nirakar ya shuny ki bhi sudhi nahi he. unhe iska bhi gyan nahi he ki kal ka svarup kya he aur niranjan kise kahte he?

nijnaam soi jaher hua, jaki sab duni raah dekhat l
mukti desi brahmand ko, aae brahm aatam sat ll

arthat: ab yah nijnaam (tartam mantra) prakat ho gaya he, jiski pratiksha sara sansaar kar raha tha isi nijnaam ko lekar paramdhamki brahmaatmaae prakat hui he. ab ve (tartam gyanke dvara) brahmand ke jeevo ko mukti degi.

Thursday, May 31, 2012

Shree Mukh Wani (Kuljam Sarup) Ka Khulasa

  • प्रथम अध्याय - माया का निरुपण
    (B) प्रक्रुति की पहचान

    (ख) ॥ मोह जल ॥

    १ भवजल चौदे भवन, निराकार पाल चौफेर ।
    त्रिगुन लहरी निरगुन की, उठे मोह अहम अंधेर ॥

    अर्थात: यह भव जल किसे भव सागर अथवा मोह सागर भी कहते है, की सीमा बडी विस्त्रुत है - लम्बी चौडी है। इस के अन्तरगत, चौदह लोक, अष्टावरण, ज्योति स्वरुप, मोह तत्व, सात शून्य आदि का अपार विस्तार है। एसे मोह सागर के चारों ओर निराकार का घेरा है। इस अंधकार से पुर्ण मोह सागर में त्रिगुन एवं निर्गुण की लहरे उठा करती है।

    २ तान तीखे ज्ञान इलम के, दुंद भमरियां अकल ।
    बहें पंथ - पैडे, आडे उलटे, झुठ अथाह मोह जल ॥

    अर्थात: इस मोह सागर की भली भांति, जानकारी न होने के कारण, लोगों में ज्ञान अथवा इलम की अनावश्यक रवेंचा तानी मची है। यह रवेचातानी (अपने मत को सर्व श्रेष्ट कहना) जन साधारण की बुद्धि में दुविधा के बवंडर खडा कर देती है। असंख्य पंथ पैडे, दिन मजहब उलटे सीधे मार्गो की तरह चल निकले है, परन्तु वे इस मोहजल से, जो अथाह असत्य का सागर है, से निकलने या पार पहुंचाने में असमर्थ है।

    ३ ता में बडे जीव मोह जल के, मगरमच्छ विकराल ।
    बडा छोटे को निगलत, एक दूजे का काल ॥

    अर्थात: इस मोह सागर में मगरमच्छ से भी विकराल और भयंकर जीव है। बडा जीव छोडे जीव को निगल रहा है। समस्त जीव काल के समान, एक दुसरे को निगलने (दबोचने) के लिए तत्पर रहते हैं।

    ४ घाट न पाई वाट किने, दिस न काहूं द्वार ।
    उपर तले मांहे बाहेर, गए कर कर खाली विचार ॥

    अर्थात: इस मिथ्या भव सागर में किसी को घाट और वाट (मार्ग) नहीं मिला, फिर दिशा और द्वार क तो कह्ना ही क्या ? बडे बडे ज्ञानी जन, जिन्हो ने अन्दर बाहेर, चारो ओर दसो दिशाओं को भी ठोक बजाकर देखा, वे भी अपने थोथे (सीमित) मंतव्य को देकर चले गए।

    ५ जीवे आतम अंधी करी, मिल अंतस्करण अंधेर ।
    गिरदवाए अंधी इन्द्रियां, तिन लई आतम को धेर ॥

    अर्थात: यहां जीव ने अन्तस्करण से मिल कर, आत्मा को अंधा बना दिया है। अंग अंग को वशीभूत करने वाली इन्द्रियों के मादक रस ने चारों ओर से आत्मा को घेर रखा है।

    ६ पांच तत्व, तारा ससि, सूर फिरें फिरे त्रिगुन निरगुन ।
    पुरुष प्रक्रुति या में फिरें, निरांकार निरंजन सुनं ॥

    अर्थात: पांच तत्व, चन्द्रमा, सूर्य, तारागण एवं नक्षत्र तथा त्रिगुन एवं निर्गुण सब के सब उसी व्रुत (दायरे) में घूम रहे है। पुरुष या प्रक्रुति कोई भी स्थिर नहीं। निराकार - निरंजन शून्य सहित सभी चलायमान है। ये सब पल पल पैदा होते है और उसी क्षण विनष्ट हो जाते है।

    ७ देत काल परिक्रमा इनकी, दोऊ तिमिर तेज दिखाए ।
    गिनती सरत पहुंचाए के, आखिर सबे उडाए ॥

    अर्थात: अंधकार और प्रकास, रात तथा दिन का व्रुत पूरा कर के, काल इन के आसपास परिक्रमा करता है। समय का चक्र श्वांसो की गिनती पूरी होते ही अन्त में यह काल, सब को लील (निगल) लेता है।


    ८ महाविष्णु सुन्य प्रक्रुति, निराकार निरंजन ।
    ए काल द्वैत को कौन है, ए सुध नहीं त्रिगुन ॥

    अर्थात: इस प्रकार महा विष्णु, शून्य प्रक्रुति, निराकार और निरंजन आदि द्वैत भाव (महा - माया) का काल अथवा समाप्त करने वाला, अद्वैत स्वरुप कौन है, इस की सुधि त्रिगुण - त्रिदेवा तक को भी नहीं।

    ९ प्रलय पैदा की सुध नहीं, तो ए क्या जाने अक्षर ।
    लोक जिमी आसमान के, इन की याही बीच नजर ॥

    अर्थात: जिन्हे उत्पत्ति और लय की ही पूरी पहचान नही, वे अक्षर ब्रह्म के विषय में क्या जाने ? यह अक्षर ब्रह्म, अक्षरातीत का सत अंग है, जो एक पलमें, एसे कई ब्रह्मांड उत्पन्न करते है और पलभर में ये ब्रह्मांड उत्पन्न होकर, लय भी हो जाते है।

    १० सो अक्षर मेरे धनी के, नित आवे दरसन ।
    ए लीला इन भांत कीइ, इत होत सदा बरतन ॥

    अर्थात: एसे अक्षर ब्रह्म, मेरे अक्षरातीत स्वामी के नित्य दर्शन को आते हैं। इस प्रकार की अनेक लीलाए, वहां नित्य निरंतर चलती रहती है।

    ११ अक्षरातीत के मोहोल में, प्रेम इसक बरतत ।
    सो सुध अक्षर को नहीं, किन विध केल करत ॥

    अर्थात: अक्षरातीत ब्रह्म के मोहोल में, सम्पादित होने वाली लीला का आनंद क्या है, इसकी सुधि अक्षर ब्रह्म तक को नहीं।

    १२ सो सुध, वतन मोहे सब दियो, मेरे अक्षरातीत धनी ।
    ब्रह्म स्रुष्ट मिने सिरोमण, मैं भई सुहागनी ॥

    अर्थात: वही परमधाम अखंड वतन है एवं पूर्ण ब्रह्म अक्षरातीत ही हमारी आत्मा के प्रियतम पति है। अपनी आत्मा का उन में समागम (एकाकार) करके मैं सुहागिन हो गई ।
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    मेरे मिठे बोलें साथजी, हुआ तुम्हारा काम ।
    प्रेम में मगन होईयों, खुलियां दरवाजा धाम ॥

    श्री राजजी के लाडलें सुंदरसाथजी के चरनों में मेरा मंगल प्रणाम

Wednesday, May 30, 2012

''कृष्ण प्रणामी धर्म''- एक सनातन धर्म


''कृष्ण प्रणामी धर्म''- एक सनातन धर्म
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सनातन का अर्थ है, जो शाश्वत हो। सदा के लिए सत्य हो जिन बातो का शाश्वत महत्व हो वही सनातन कही गई है । जैसे- सत्य सनातन है, परमात्मा सत्य है, आत्मा सत्य है, अखण्ड मोक्ष सत्य है ।मनुष्य का परम उद्देश्य उस परम सत्य को जानना उसको प्राप्त करना वह सत्य जिसे मनुष्य जानना चाहता है, जिसे वह पाना चाहता है उसी सत्य के मार्ग को बताने वाला धर्म सनातन धर्म है।आज विश्व में अनेकों धर्म और सम्प्रदायों का प्रचलन है किन्तु उन सभी धर्म और सम्प्रदायों मूल में एक मात्र सनातन धर्म है अर्थात दूसरेशब्दों में कह दिया जाए मूल धर्म तो सनातन धर्म है; हिन्दु ,मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी आदि सनातन धर्म के सम्प्रदाय मात्र है।

सनातन धर्म एकेश्वरवादी है। इस संदर्भ वेदों का कथन है-
''एको ब्रह्म द्वितीय नास्ती ।''
ब्रह्म एक है, अर्थात वह परमात्मा एक ही है, इसके अलावा कोई दूसरा ईश्वर नहीं।कुछ इसी प्रकार का मत कुरान का भी है-
'' ला ईलाह ईल अल्लाह ''
वह अल्लाह एक ही है, उसके अलावा दूसरा कोई माबूद नहीं ।बाईबल भी इसी प्रकार के मत का पोषण करती है, अतः यदि हम सनातन धर्म अर्थात परमात्मा के धर्म का अनुपालन करते है तो हमें बहुदेव वाद, अवतार वाद, पैगम्बरों, तिर्थंकरों आदि के स्थान पर परब्रह्म परमात्मा को स्थापित करना होगा ।क्योंकी हमारें आदि ग्रन्थ जिसके बारे में हमार सर्वमान्य मत है कि वे परमात्मा कि वाणी है,वेदों के बारे मे कथन है- चार ॠषि जब हिमालय की गुफाओं मे तपस्या मे लिप्त थे तब उनके कानो ने इस वाणी(वेदों) को सुना कुरान शरीफ भी खुदा की आवाज है जब हजरत मुहम्द साहब 'गार ए हिरा' में इबादत कर रहें थे तब उनकें कानों ने कुरान की आयतें सुनी , बाईबल के बारें में भी कुछ इसी तरह की अवधारणा प्रचलित है, वह परमात्मा से प्रेरित फांट है, तथा इन सभी धर्म ग्रन्थों मे परमात्मा ने अपने अवतरण और ब्रह्म विषयक गुढ रहस्यों को समय समय पर फरिश्तों के माध्यम से अंकित करवाया है ।प्रायः सभी धर्म ग्रन्थों नें परमात्मा के अवतरण की भविष्यवाणियां नियत तिथियों के व उनके अवतरण की निशानियों के साथ के साथ है। हिन्दु धर्म शास्त्रों का मत का मत है विजियाभिनंदन प्रकट होंगें वह निश्कंलक होगें कलयुग के प्रभाव को नष्ट करेगें, कुरान शरीफ कह्ता है- कयामत के समय खुदाताला स्वयं इमाम मेंहदी केरूप मे जाहिर होगें व तोहीद राह (एक खुदा कि पूजा )का प्रचार करते हूए सत्य धर्म की स्थापना करेंगें, बाईबल क मत भी इसी प्रकार का है-ईसा मसीह पुनः अवतरित होगें व सत्य धर्म की स्थापना करेंगें , यहूदियों का मानना है कि , अन्तिम घडी में मूसा पैगम्बर आयेंगें तथा उसकें द्वारा समस्त जीवों कों मुक्ति मिलेगी अतः समस्त धर्म ग्रन्थों की भविष्यवाणियों के अनुरूप विश्व धर्म की स्थापना हैतु व अखंड मुक्तिदाता के रूप मे स्वलीला द्वैत सम्पन्न महामती श्री प्राणनाथ का प्रादुर्भाव सत्रहवी शताब्दी में हुआ उनका मूल नाम मिहिर राज था मिहिर का अर्थ संस्कृत व अरबी दौनों भाषा मे सूर्य होता है,तथा राज अर्थात ''राजते स्वयं प्रकाशित यः स राजः '' अर्थात अनादि अक्षरातीत पूर्णब्रह्म श्री राज परम धाम (लाहुत /अर्शु अजीम /upper heaven /own land )से अवतरित हुए । कुरान मे स्पष्ट शब्दों मे उल्लेखित किया गया है कयामत के समय खुदा की साक्षी देने वाला स्वयं खुदा ही होगा ।

श्री प्राणनाथ जी ने तारतम वाणी से जो कि पूर्णब्रह्म सच्चिदानंद स्वरूप अक्षरातीत परमात्मा का साक्षात स्वरूप है के माध्यम से विश्व के समस्त धर्मों के गुढ अभिप्रेत अर्थ तथा मुक्तात हराफ(जिन शब्दों पर परमात्मा का ताला /कुफल लगा है) उन्है खोला । कुरान मे स्पष्ट शब्दों में कहा गया जो इन भेंदों को स्पष्ट करे उसे ही अल्लाह समझना ।महामती प्राणनाथ जी ने तारतम सागर / कुलजम स्वरूप ग्रन्थ जो कि परब्रह्म तथा उनके अखण्ड धाम व उनकी लीलओं का ज्ञान देने वाली ब्रह्मवाणी (साक्षात परमात्मा अक्षरातीत प्राणनाथ जी के मुखारविन्द से अवतरित ) ''इलम ए लदुन्नी'' है। यह ब्रह्मवाणी अखण्ड मोक्ष प्रदायनी है। तथा उनके द्वार स्थापित धर्म जिसे कृष्ण प्रणामी धर्म या निजानंद धर्म के नाम से भी जाना जात है वह सम्पूर्ण संसार का वैमनस्य मिटाकर सत्य धर्म की स्थापना का मार्ग प्रशस्त करता है-
''कलंक रहित सतधर्म आप्यो, ज्ञान खड्क लखि कलयुग कांपयो ।
निजानंद धर्म निष्कलंक को जो इह, जीव सकल को परम पद देहि ॥

अर्थात आत्म ( निजानंद) धर्म के अलावा कोई अलग धर्म अथवा सम्प्रदाय नही है अपितु सब धर्मो की सामुहिक पहचान -कुल जम सरूप है और समस्त जीवों को शाश्वत मुक्ति क अधिकारी बनाएगा ।

प्रेम प्रणाम जी
 
प्रथम अध्याय - माया का निरुपण
(A) (स्वरुप, उदगम एवं विस्तार)

(ख)

१ वेदान्ती माया को यो कहें, काल तीनों जरा भी नांहे ।
चेतन व्यापी जो देखियें, सो भी उडावे तिन पांहे ॥

२ ना कछु नाकछु, ए कहें, ओ सत चिद आनंद ।

असत सत को न संग, ए क्यों कर होए सम्बंध ॥

३ ए जो व्यापक आत्मा, पर आतम के संग ।
क्यों ब्रह्म नेहेचल पाइये, इत बीच नार को फंद ॥

४ निवेरा खीर नीर का महामत करे कौन और ।
माया ब्रह्म चिन्हाए के, सतगुरु बतावे ठौर ॥

अर्थात:
वेदान्ती लोग एक और तो " सर्वखलुइदमब्रह्म " की घोषणा करते है और दूसरी और माया के किए कहते है कि इस माया का तीनो काल - भूत, वर्तमान एवं भविष्य में अस्तित्व ही नहीं। इस प्रकार से सर्वव्यापक चेतन तत्व को भी इसी के अन्त: भुक्त कर देते है।

(२) परम तत्व का परिचय "यह नही है" "यह नही है" अर्थात नकारात्मक शब्दो में देते है। परन्तु वह परम तत्व तो, सत, चिद, आनंद - सच्चिदानंद स्वरुप है। असत्य माया और सत्यब्रह्म कभी नही सकते। इन का सम्बध ही कैसे हो सक्ता है ?

(३) यह आत्मा जो सब में व्याप्त हैं, उस का सम्बंध परात्मसे है। इन दोनों के बीच इस माया का भ्रम जाल फैला है। अखंड अविनाशी ब्रह्म को कैसे पाया जाए, यही प्रश्नात्मक चिह्न है ?

(४) श्री महामतिजी कहते हैं कि खीर तथा नीर का विवेचन अर्थात ब्रह्म और माया का निर्णय, सत गुरु के बिना कौन कर सकता है ? माया और ब्रह्म की पहचान करा के अखंड घर का परिचय मात्र सत गुरु ही दे सकते हैं।

श्री राजजी की लाडली सखी के चरनों में मेरा प्रेम प्रणाम
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(B) प्रक्रुति की पहचान

भगवान गीता में श्री क्रिष्ण जी ने अर्जुन को प्रक्रुति के विषय में बतलाते हुए कहा है।

भूमिरापोडनलो वायु: खंमनोबुद्धरेवच ।
अहंकार इति इयम मे भिन्ना प्रक्रुतिर ष्रुधा ॥

अर्थात:
भूमि (प्रुथ्वी) , जल, तेज (अग्नि), वायु, आकाश, मन, बुद्धि, एवं अहंकार - ये उनकी आठ प्रकार की प्रक्रुति है। इस सम्बंध में यदि वैराट के पट (नकशा) का भली भांती अवलोकन किया जाए तो उपरोक्त आठ प्रकार की प्रक्रुति, अष्टावरण - आठ आवरणों के रुप में चौदह लोकों (अतल - वितल - सुतल - तलातल - महातल - रसातल - पाताल तथा भू (म्रुत्यु) लोक, भवंर लोक, स्वर्ग लोक, महर्लोक, जन लोक, तप लोक, एवं सत लोक) को घेरे हुए है जो कि माया का दूसरा रुप है। इस पूर्णतय: पहचान " श्री मुख वाणी " के किरन्तन ग्रन्थ के एक प्रकरण में, निम्न प्रकार से कराई गई है:-

(क)
१ माया आद अनाद की, चली जात अंधेर ।
निरगुन सरगुन होए के व्यापक, आए फिरत है फेर ॥

२ ना पहचान प्रक्रुति की, ना पहचान हुकम ।
ना सुध ठौर नेहेचल की, ना सुध रुप ब्रह्म ॥

३ सुध नही निराकार की और सुध नही सुनं ।
सुध न सरुप काल की, ना सुध भई निरंजन ॥

४ ना सुध जीव सरुप की, ना सुध जीव वतन ।
ना सुध मोह तत्व की, जिन थे अहम उत्पन ॥

५ शास्त्रों जीव अमर कह्यो, और प्रलय चौदे भवन ।
और प्रलय पांचो तत्व, प्रलय कहे त्रिगुन ॥

६ और प्रलय प्रक्रुति कही, और प्रलय सब उतपन ।
ना सुध ब्रह्म अद्दैत की, ए कबहुं न कही किन ॥

७ ए आद के संसे अब लों, किनहुं न खोले किन ।
सो साहेब इत आएके, खोल दिए मोहे सब ॥

८ प्रक्रुति पैदा करे, एसे कई इंड आलम ।
ए ठौर माया ब्रह्म सबलिक, त्रिगुन की प्ररात्म ॥

९ कै इंड अक्षर की नजरों, पल में होए पैदाए ।
एसे ही इंड जात हैं, एक निमख में नास ॥

१० केवल ब्रह्म अक्षरातीत, सत चिद आनंद ब्रह्म ।
ए कह्यो मोहे नेहेचे कर, इन आनंद में हम तुम ॥

११ हबीब बताया हादिए, मेरा ही मुझ पास ।
कर कुरबानी अपनी, जाहेर करुं विलास ॥

१२ ब्रह्म स्रुष्टि और ब्रह्म की है सुध कतेब - वेद ।
सो आप आखर आए के, अपना जाहेर किया सब भेद ॥

अर्थात:
इस मायावी स्रुष्टि की हकीकत बडी विचित्र है। यह *आदिा तथा *अनादि काल से अंधकार में चली जा रही है। कहीं पर साकार रुपमें और कहीं पर निराकार रुपमें, सारे संसार में व्याप्त हो कर आबागमन (जीवन एवं मरण) के चक्कर में पडी है।

(२) इस मायावी संसार के लोगों को अक्षरब्रह्म की इच्छा शक्ति अर्थात मूल प्रक्रुति की पहचान नहीं है, जिस के द्वारा यह स्रुष्टि स्रुजित होती है। न ही उन्हें अखंड एवं अद्वैत धाम की पहचान है और न ही ब्रह्म के वास्तविक स्चरुप का ज्ञान ।

(३) किसी को निराकार और शून्य के तथ्य की भी पहचान नहीं की यह माया किस प्रकार से निराकार हो कर सब में व्याप्त है और अन्तरात्मा में ह्रदय को किस प्रकार अपने अंधकार से शून्य कर देती है, इस की जानकारी भी किसी को नहीं। इस माया की काल शक्ति के द्वारा प्राणियों के प्राण किस प्रकार नष्ट होते हैं और किस प्रकार किसीको नजर न आने से निरंजन कहलाती है, इस तथ्य की पहचान भी किसी को नहीं।

(४) इस संसार के मायावी ज्ञान के लोगों को, यह भी जानकारी नहीं कि उन के जीव का मूल सम्बंध कहां से है और कैसा है तथा इस जीव की उत्पत्ति का स्थान काहां से है ? इस के अतिरिक्त मोहतत्व जिस से अहंकार की उत्पत्ति हुई है उस के उत्पन्न होने का कारण अर्थात कहां से एवं किस प्रकार मोह उत्पन्न हुआ, इस की भी पहचान किसी को नहीं।

(५) शास्त्रों में जीव को तो अमर अविनाशी कर के कहा है और चौदह लोकों की स्रुष्टि को नाशवान बताया है। यहां तक की पांचो तत्व के साथ साथ तीनों गुणो (सत - तम - रज) के देव *ब्रह्म - विष्णु - महेश को भी प्रलय में नाशवान बताया है।

(६) शास्त्र यह भी कहते है कि प्रक्रुति स्वयं प्रलय आधीन है। उस में जो भी रचनाए हैं अथवा जितनी भी वस्तुए पैदा होती है और प्राणी जन्म लेते है वे सब प्रलय में नाश होने वाले है। परन्तु इस माया से रहित अद्वैत ब्रह्म और उस के परम धाम की वार्ता (बात) किसी ने नहीं की।

(७) इन सब के विषयमें, आदि काल से आज तक, चले आ रहे संशयो का निवारण किसीने नहीं किया। निजानंद स्वामी श्री देवचंद्रजी ने यहां प्रकट हो कर इन सब का निवारण कर दिया।

(८) मूल प्रक्रुति, इस संसार की भांति अनेक ब्रह्मांड उत्पन्न करती है। त्रिगुणात्मक तीनों देव - ब्रह्मा, विष्णु, महेश के परात्म स्वरुप और माया की उत्पत्ति का स्थान अक्षर ब्रह्म के अन्तर्गत सबलिक ब्रह्म है।

(९) एसे कई त्रिगुणात्मक ब्रह्मांड, अक्षरब्रह्म की द्रुष्टि के पाव - पलक (भाव भंगिमा) में पैदा हो कर क्षण भर में नष्ट हो जाते हैं।

(१०) निजानंद स्वामी धनी देवचंद्रजी ने बताया कि अक्षरातीत ब्रह्म ही केवल अद्वैत सच्चिदानंद स्वरुप परमात्मा है। उसी के परमधाम आनंद धाम में हमारी परात्म विध्यमान है।

(११) हादी - सतगुरु ने यह भी कहा कि तुम्हारा प्रियतम परमात्मा * श्री राजजी निश्चित रुप से तुम्हारे पास (निकटतम) ही हैं। उन पर अपने अहम (मैं पन) को अर्थात स्वयं को निछावर करते हुए, उस की निजलीला में विलास करो और उस अद्वैत एवं प्रेममयी लीला को संसार में जाहेर करो।

(१२) इस प्रकार पूर्ण ब्रह्म अक्षरातीत ने सतगुरु के रुप में प्रगट हो कर, ब्रह्म एवं ब्रह्म आत्माओं के जो संकेत वेद और कतेब में है, उन संकेतो को रहस्यमयी वाणी को अन्तिम घडी में अर्थात सामूहीक जागनी की वेला में स्वयं स्पष्ट कर दिए।

श्री राजजी की परम सखीयों के चरणों में मेरा प्रेम प्रणाम
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Monday, May 28, 2012

Shree Mukhwani (Shree Kuljam Sarup - Shree Tartam Wani) Ka Khulasa

प्रथम अध्याय - माया का निरुपण
(A) (स्वरुप, उदगम एवं विस्तार)

" वीर्य हिरण्यमयम देवो मायया व्यस्रुजत त्रिधा " (भा. २/१०/९३)


व्याख्या:- पुर्ण ब्रह्म अक्षरातीत सच्चिदानंद स्वरुप परमात्मा की प्रेरणासे, अक्षरब्रह्म के ह्रदय से सुमंगला नामक शक्ति ने निकल कर महा मोहरुप निद्रा का रुप धारण किया। इस की विक्षेपा और आव्रुति नाम की दो शक्तिया है। आव्रुति ने ज्ञान ढक दिया और विक्षेपा से भ्रम उत्पन्न हुआ। फलस
्वरुप, अक्षरब्रह्म जाग्रुत अवस्था में देखने वाले ब्रह्मांड को फरामोशी की नींद में डूब कर देखने लगे और अक्षरब्रह्म का मन अंडकार हो कर, उस महा मोह रुप जल में तैरने लगा।
यथा:-

नि:प्रभेडस्मिन निरालोके सर्वत: तमसाव्रुते ।
ब्रहतअंडम अभूत एकम अक्षरम कारणम पदम ॥ (मार. पु. १३/२९)
वर्षयुग सहस्त्रान्ते तदडंम उदके शयम ।
काल कर्म स्वभावस्थो जीवो जीवमजीवयत ॥ (भा. ६/३४)

इस प्रकार जल में तैरता हुआ अक्षरब्रह्म का मन ही हिरण्य गर्भ अण्ड है। जब तक उस में अक्षर ब्रह्म की चेतन सूरत संचारित नहीं हुई, तब तक वह निर्जीव रहा। तत्पश्चात जिस प्रकार स्वप्न में स्वयं की चित सूरत का ही सब कुछ दिखाई देता है, इसी प्रकार अक्षरब्रहम की सुरता ही अण्ड में जीव रुप हो कर प्रविष्ट हुई और अण्ड फूट गया। परिणाम स्वरुप अक्षरब्रह्म की सूरत जन्य पुरुष नारायण के रुप में आ गई। इसी रुप को पुरुष अवतार की संज्ञा देते हुए श्री मद भागवत के प्रथम स्कंध में, इस की महीमा का गान इस प्रकार हुआ है:-

जग्रुहे पौरुषं रुपं भगवान महदादिभि: ।
सम्भूतं षोडश कलमादौ लोकसि स्रुक्षया ॥
यस्याम्भसि शयानस्य योग निद्राम वितन्वत: ।
नाभि ह्रदाम्बुजादासीत ब्रह्मा विश्व स्रुजाम पति ॥

अर्थात:
भगवान ते महत - तत्व आदि से निष्पन्न पुरुष रुप धारण किया। उस में दस इन्द्रिया एक मन और पांच भूत - ये सोलह कलाएं थी। उन्हों ने कारण जल में शयन करते हुए, निद्रा का विस्तार किया, तन उनके नाभि सरोवर से एक कमल प्रगट हुआ और उस कमल से ब्रह्माजी उतपन्न हुए, जिन्हों ने क्रमश: मानसिक एवं मैथुन स्रुष्टि की रचना की। अत: " श्री मुख वाणी " के " किरन्त ग्रन्थ " में, इस संदर्भ में उल्लेख हुआ है:-

(क)
१ कहो कहो जी ठौर नहेचल, वतन कहां ब्रह्म को ॥ टेक ॥
तुम तीन सरीर तज भए ब्रह्म, पायो पूरन ज्ञान ।
जो लो संसे ना मिटे, साधों तो लो होत हेरान ॥

२ पेहेले पेड देखो मायाको, जा को ना पाइए पार ।
जगत जनेता जोगनी, सो कहावत बालकुमार ॥

३ मात पिता बिन जन्मी, आपे बंझा पिंड ।
पुरुष अंग छूयो नहीं, और जायो सब ब्रह्मांड ॥

४ आद अंत या को नहीं, नहीं रुप रंग रेख ।
अंग न इन्द्री तेज न जोत, एसी आप अलेख ॥

५ पढ पढ थाकें पंडित, करी न निरने किन ।
त्रिगुन त्रिलोकी होए के, खेले तीनों काल मगन ॥

६ विस्नु, ब्रह्मा, रुद्र, जन्मे हुई तीनो की नार ।
निरलेप काहू न लेपही, नारी है परनाहीं आकार ॥

७ गगन पाताल मेर सिखरों, अष्ट कुली बनाए ।
पचास कोट जोजन जिमी, सागर सात समाए ॥

८ लाख चौरासी जीब जंत, ए बांधे सबे निरवान ।
थिर चर आद अनादलों, ए मरी चारों खान ॥

९ पांच तत्व चौदेलोक, पाव पलमें उपजाए ।
खेल एसे अनेक रचे, नार निरंजन राए ॥

१० ए काली किन पाई नहीं, सब छाया में रहे उरझाए ।
उपजे मोह अहंकार थे, सो मोह में भरमाए ॥

अर्थात :
हे ज्ञानी जनो ! आप बताइए कि अविनाशी भूमिका पार ब्रह्म का धाम कहां है ? आप इस बात का दावा करते हो कि आप ने तीनों शरीरों - स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण, को छोड दिया है अत: आप ब्रह्म रुप है। आप यह भी कहते हो कि आपको शास्त्रों आदि का पुर्णज्ञान है और आप ने तत्व ज्ञान का अनुभव कर लिया है। यदि एसा है तो आप निश्चित रुप से बताइए कि आप का मूल घर कहा है ?

(२) पहले इस माया का मूल देखो। इसका पार नहीं पाया जा सकता। कैसी विडम्बना है कि सारे संसार को जन्म देने वाली योगिनी माया बालकुमारी कहलाती है।

(३) एक तो इसने बिना माता पिता के जन्म लिया। दूसरा यह कि शरीर से बांझ है। पुरुष के शरीर का स्पर्श पाये बिना ही यह सारे संसार की जन्म दात्री बन गई।

(४) इस का कोई आदि अंत नहीं और न ही कोई रुप या आकार ही है। अंग इन्द्रिय तेज ज्योति आदि से विहीन यह अद्रुश्य और अगोचर है ।

(५) इसे जानने के प्रयास में कितने ही पंडित पोथी पढ कर थक गए परन्तु इसके स्वरुप का निर्णय न हो सका। तीनों गुणो को धारण कर, त्रिलोकी की स्वामिनी बनी एवं यही तीनों काल में मग्न हो कर खेल रही है।

(६) ब्रह्मा, विष्णु और शिव तीनों को इसने जन्म दिया और फिर तीनों की नारी बन गई। इतना कर के भी यह निर्लिप्ता, किसी पर आसक्त नहीं होती। कहनें को तो यह मोहिनी नारी है, परन्तु इस का कोई आकार नहीं।

(७) इस माया ने आकाश से पाताल तक समेरु पर्वत के शिखर और आठ पर्वतों के समूह को रच डाला। इसी के अन्तर्गत पचास कोटि योजन धरती और सात सागर समा गए।

(८) इस ने चौरसी लाख योनीयों में पडे जीव जन्तुओं को बडी युक्ति से काल बंधन में बांधा हुआ है। चारो खांन अर्थात अण्डज (अंडे से मुर्गी आदि) उदभिज (धरती से वनस्पति आदि) स्वेद्ज ( पसीने से खटमल आदि) एवं पिंडज (शरीर स्पर्श से प्राणी) - इन चारों प्रकार से उतपन्न चल - अचल, जड - चेतन स्रुष्टि में यह अनादि काल से समाई है।

(९) इस माया ने पांच तत्वों के द्वारा पल भर में चौदाह लोक रच दिये। निरंजन देव की रानी (यह माया) एसे ही अनेक खेल रचाती है।

(१०) इस अंधकार की स्रुष्टा, इस काल रात्रि को कोई पकड नहीं पाया। सब प्रतिबिम्ब (छाया) में ही उलझ रहे है। मोह, अहंकार से उत्पन्न सभी जीव मोह में ही भ्रमीत है।

आदरणीय धर्मपरायण सुंदरसाथजी के चरनों में मेरा कोतान कोत प्रणाम

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Saturday, May 26, 2012

Shree Mukhwani (Shree Kuljam Sarup Sahab - Shree Tartam Wani) Ka Khulasa



॥ प्राक - वचन ॥ 
इस तथ्य की पुर्नाव्रुति करने की आवश्यक्ता नहीं कि " श्री मुख वाणी " (कुलजम सरुप अथवा तारतम सागर) आत्मा एवं परमात्मा की एक अनुपम गाथा है, जो अपने आप में, अथाह सागर के रुप में, परमधाम से, पूर्णब्रह्म अक्षरातीत सच्चिदानन्द ' सरुप श्री ' राजजी द्वार प्रगट हुई है। इस तारतम वाणी की विशेषत: यह है कि आत्म जाग्रुति के साथ साथ, समस्त धर्मग्रन्थो की भूमिका निर्धारित करके, सब के प्रति निश्च ित मत देती है अर्थात समस्त धर्मो के गूढार्थ स्पष्ट करने की कुंजी है। इतना ही नहीं, यह कुंजी क्षर जगत के पार शून्य निराकार आदि से परे, अक्षर ब्रह्म से भी अतीत का सार तत्तव दर्शाकर आत्माको अपने घर परमधाम एवं अक्षरातीत के अखंड सुख देते हुए मूल स्वरुप में एकाकार करती है। यथा:-

(१) अरस अजीम के बाग जो, हौज जोए जानवर । इत सक जरा न काहू में, मोहोल तथा मन्दिर ॥ (सागर ग्रं.) (२) ए बल देखों कुंजीय का, खूब देखी हक सूरत । हक के दिल के भेद जो, सो इलमें देखी मारफत ॥
(३) बल क्यों कहूं इन कुंजीय का, जो हक दिल गुझ इसक । तिन दरयाव की नेहेरें, उतरी नासूत में बेसक ॥
(४) ए बल देखो कुंजीय का, जिन देखाई निसबत । ए जो रुहें जात हक की, जिन बेसक देखी वाहेदत ॥
 (५) ए बल देखो कुंजीय का, रुहें बैठाई जुदे कर । आप कहे संदेशे कहावही, आप ल्याए जुदे जुदे नाम घर ॥ (सागर ग्रं.) अर्थात:- इस कुंजी - तारतम ज्ञान के द्वारा, नि:संदेह, सत - आत्माओं को परमधाम के २४ पक्षों -- धाम, हौजकौसर ताल, जमुनाकी, माणिक एवं पुखराज पर्वत - वन की नेहेरे, कुंज बन तथा मोहोल मन्दिरो आदि का साक्षातकार हुआ।

 (२) इस कुंजी - तारतम ज्ञान के द्वारा ब्रह्मात्माओं ने जी भर कर " सच्चिदानन्द घन स्वरुप परमात्मा " की छबि को देखा एवं फल स्वरुप अपने ह्रदय में प्रेम एवं इश्क की तरंगो का अनुभव किया।
 (३) सच्चिदानन्द घन स्वरुप श्री राजजी का दिल इश्क का सागर है। उस इश्क सागर से ब्र्हम ज्ञानरुपी नेहेरे पांच सरुपो के माध्यम से इस म्रुत्यु लोक्में उतरी, जिसकी बदौलत संसार के समस्त जीवों को शाश्बत (अखंड) मु्क्ति का अधिकार मिला।
 (४) इस कुंजी - तारतम ज्ञान की एक और खासीयत - विशेषत: देखिये। इस ने ब्रह्मात्माओं का सम्बंध अक्षरातीत ब्रह्म - परमात्मा के साथ अंगी - अंगता के रुप में दर्शाते हुए उन्हे अरस - परस कर दिया और इस प्रकार वाहेदत के एकत्व रुप का आत्माओं को साक्षात कराया।
 (५) इस तारतम ज्ञान रुपी कुंजी का बल तो देखो, इसने आत्माओ के दोनो सरुपों को पहचaान करा दी। जबकि रुहो के असल तन तो परमधाम में बिराजमान है, उन के सुपन के तन इस संसार में मौजूद हैं और आप स्वयं पूर्ण ब्रह्म अक्षरातीत श्री राजजी इस संसार में अवतरित हुए और जुदे जुदे नाम धरकर अर्थात श्री क्रिष्ण, निजानंद स्वामी देवचन्द्रजी तथा श्री प्राणनाथजी आदि के सरुपों में यहां ब्रह्मलीला की और अन्तत: तारतम ज्ञान - खुदाई इलम के द्वारा अखंड मुक्तिधामों के द्वार खोलते हुए संसार के समस्त जीवों को शाश्वत मुक्ति का अधिकारी बना दिया ।
इस संसार में अवतरित होने एवं सत आत्माओ का परमधाम वापिस लौटने तक के सभी प्रसंगो का संक्षिप्त में उल्लेख किया गया है। सर्वप्रथम इस भाग में " माया का निरुपण " उस का स्वरुप, उदगम एवं विस्तार का समावेश है। तत पश्चात प्रक्रुति - शून्य मंडल एवं अखंड मंडल का खुलासा करते हुए, अन्तत: पूर्ण ब्रह्म अक्षरातीत का ब्रह्मात्माओं के साथ अवतरण एवं इस संसार में उन की दिव्य लीलाओं का लगभग ५०० चौपाइयों में संकलन है। इन चौपाइयों द्वारा " श्री मुख वाणी " के मुख्य प्रसंगो को एक सूत्र - लडी में पिरोने का तुच्छ प्रयास किया गया है। यदि इइन चौपाइयो एवं प्रकरणों के चयन में कुछ त्रुटि रह गई हो, तो उसी कमी को प्रथम समझते हुए, सर्वज्ञ सुन्दरसाथ दर - गुजर (नजर अन्दाज) करेंगे और इस भाग में निहित सार तत्व का रस पान करते हुए हमें अनुग्रहित करेंगे।
 प्रेम प्रणाम सुन्दरसाथजी

प्रथम अध्याय - माया का निरुपण
(A) (स्वरुप, उदगम एवं विस्तार)

माया का यदि विश्लेषण किया जाए तो यह दो शब्दो का संगम है - मा तथा या। देव भाषा संस्क्रुत में मा जा अर्थ होता है ' नहीं ' और या का अर्थ होता है ' जो ' अर्थात जो कुछ भी नही - नकारात्मक है, उसे माया कहते है।

वास्तविक रुप में यधपि यह कुछ भी नही, तथापि व्यवहारिक रुप में, यह बडी शक्तिशालिनी है। जडमें चेतन, तथा चेतन में जड का अधि - आरोप कर लेना इसका गुण है। असत को सत तथा सत को असत अथवा शरीर को आत्मा और आत्मा को शरीर समझने का नाम माया है। दूसरे शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि भ्रमात्मक ज्ञान माया का स्वरुप है। इसका आकर्षण मरुस्थल (रेगिस्तान) में चमकती हुई रेत की तरह है, जिसे देख कर म्रुग अपनी तुष्णा (प्यास) बुझाने के लिए दौडता है, किन्तु भ्रम अथवा अज्ञान के कारण, उस की प्यास नहीं बुझती, क्योंकी वह केवल जल की प्रतीति होती हौ, वास्तविक जल नहीं। इसी प्रकार माया का आधार भी भ्रमात्मक ज्ञान है, असलीयत कुछ भी नहीं होती। " श्री मुख वाणी " में इस माया को आठ नामों से सम्बोधित किया गया है। यथा:-

मोह, अज्ञान, भरमना, करम काल और सुंन ।
ए सारे नाम नींद के, निराकार निरगुन ॥ (कलस ग़्रं.)

माया का भली भांति निरुपण करने पर इस तथ्य की पुष्टि होती हौ कि इस की उत्पत्ति स्रुष्टि के आदि से है अर्थात जब से स्रुष्टि का प्रारम्भ हुआ है, उसी के साथ इस का भी जन्म हुआ है। यही कारण है कि " श्री मुख वाणी " में इस ब्रह्मांड को मायावी अथवा ठगनेवाला कहा है। बडे बडे ज्ञानी मुनि एवं साधु जन भी इस के प्रभाव से बच न सके। श्री महामतिजी दो - एक उदाहरण देते हुए, " श्री मुख वाणी " के " प्रकाश ग्रन्थ " मे इस का चित्रण निम्न रुप से करते है:-

एसा खेल छल का, छोडाए नहीं ।
ब्रह्मांड की कारीगरी सारी करी सही ॥
कबूतर बाजीगर के, जैसे कडियां भरियां ।
तब ही देखे फूंक देएके, तुरंत खाली करिया ॥
एसी बाजी इन छल की, ब्रह्मांड जो रचियो ।
देख बाजी कबूतर, साथ मांहे मचियो ॥

अर्थात:- जिस प्रकार बाजीगर, जादू के खेल मे कबूतर बना कर, पिटारा भर देता है और फूंक मारने से वे कबूतर कहां अद्रुश्य हो जाते हैं, तथ्य का पता नहीं चलता और उस का पिटारा वैसे ही खाली दिखाई देता है, इसी प्रकार ब्रह्मांड का खेल भी, जादूगर के खेल की तरह रचा गया है। आत्माएं जादू के कबूतरों को देखने के लिए परमधाम अपने मूल स्थान से चली आई और इस संसार में आ कर, यहां मग्न हो गई और भ्रमित हो रही है।

आंबो बोए, जल सींचियो, तब ही फूले फलियो ।
विध विध की रंग बेलियो, बन उपर चढियो ॥
ए देख चित्त भरमिया, सुध नहीं सरीर ।
विकल भई रंग बेलियां, चित्त नांही धीर ॥
तत रिवन कछु न देखिये, बाजीगर हाथ ।
आंबो न कछु बेलिया, या रंग बांध्यो साथ ॥

अर्थात:-
जिस प्रकार जादूगर, अपनी जादू की शक्ति से, एक आम के बीज को रोप देता है और सींच कर तुरन्त फलता फूलता व्रुक्ष बना देता है और उस पर विविध रंगो की बेलें भी चढा देता है। परिणाम स्वरुप, एसे करतब (कार्य कुश्लता) को देखकर देखनेवाला मन, भ्रमित हो जाता है और उसे अपने शरीर तक ही सुधि नहीं रहती। उसकी समझ में यह नहीं आता की ये विविध रंगो की बेलें, व्रुक्ष आदि कहां से प्रगट हो गए ? इस संकल्प में, मन स्थिर नहीं रहता। फिर उसी क्षण देखते है कि जादूगर के हाथ कुछ नहीं होता। न तो आम ही दिखाई देता है और न ही उस पर चढी हुई बेलें। श्री महामति जी कहते हैं कि इसी प्रकार संसार के सम्मोहन में, ब्रह्मात्माए भ्रमित हो रही है अर्थात इस शरीर रुपी आम्र व्रुक्ष में, कुटुम्ब परिवार की बेलें, फुलती फलती हैं, परन्तु म्रुत्यु के समय, कोई कुछ नहीं देख पाता।

प्रणाम श्री राजजी के लाडलें सुंदरसाथजी को

Tuesday, May 22, 2012

SHREE KRISHNA TRIDHA LEELA - 1


1. EK BAAR JO SHREE KRISHNA KO PRANAM KAR LETA HE. USE DAS ASHVAMEGHYAGNA KA FAL MILTA HE. DAS ASHVAMEGH YAGNA KARNE WALE KA SANSAAR ME PUNAH JANMA HOTA HE, PARANTU SHREE KRISHNA KO PRANAM KARNE WALA SADA KE LIYE SANSAAR BANDHAN SE MUKT HOJATA HE. SHREE KRISHNAJI SE PREM KE BINA SAMASTA GYAN MITHYA HE. SHREE MUKHWANI ME SHREE PRANNATHJI NE KAHA HE - " PAR TOLE NA AAVE EK NE, MUKH SHREE KRISHNA KAHANT l "

2. SHREE KRISHNA - KEVAL VISHNU KE AVATAAR VASUDEV KE PUTRA HI NAHI HE BALKI UNKA APNA NITYA PARAMDHAM PRAKRUTI SE PARE STHIT HE, JO UTTAM PURUSH AKSHARATIT PAR BRAHMA SVAROOP HE, UNKE HI SAT SANG AKSHAR BRHAM HE JINKE ANT: KARAN ME GOLOKDHAM HE JISME PRATIBHASH SVAROOP SHREE KRISHNA SATYA VIDHYAMAAN HE. UNKA HI TEJ JAGAT KE SABHI DEVO, AVTAARO, TIRTHKARO, PAIGAMBARO AUR DIVYA PURUSHO ME AATA HE, SARVOPARI SHREE KRISHNA TATVA KO SHASTRAKAR TO " KRISHNASTU BHAGVAN SVAYAM " KAHAKAR VARNAN KARTE HE. JO SARE JAGAT ME SRESHTHTAM EVAM VANDNIY HE. NIJANAND SAMPRADAY (SHREE KRISHNA PRANAMI DHARMA) KE AADHYA SANSTHAPAK SATGURU SHREE DHANI DEVCHANDRAJI MAHARAJ KO UNHI SHREE KRISHNAJI KA, JAGAT GURU KE ROOP ME SAKSHATKAR HUA.

3. NIJANAND SATGURU KE PRAMUKH SISHYA SHREE MEHERAJ THAKUR HUYE. (1618 - 1694 I.) JINKI ANTERAATMA ME PANCH SHAKTIYA AKSHARATIT SHREE KRISHNA TATVA SE AAKAR SAMAVISHT HUI, AT: VE PRANAMI DHARMA KE AADHYA PRAVARTAK MAHAMATI SHREE PRANNATH JI ROOP ME BRAHM SVAROOP MANYA VA PUJYA HE, JINKA DIVYA GYAN UNKE SHREE MUKH SE NISRUT " TARTAM SAGAR " GRANTH KE ROOP ME UPLABDHA HE.

4. SHREE KRISHNAJI KI TRIDHA LEELAO KA SILSILEVAR VARNAN MAHAMATI SHREE PRANNATHJI KI APNI DIVYA DRUSHTI SE AVATARIT SHREE TARTAM SAGAR ME VISTUT ROOP SE UPLABDHA HE. SHREE KRISHNAJI KI TRIDHA LEELA ME UNKI BAAL LEELA AUR RAAS LEELA SABSE MAHATVAPURN HE KYONKI YAH DONO LEELAE PURNBRHAM PARMATMA SACHCHIDANAND AKSHARATIT KI HE. BHAGVAN KRISHNAJI KA MANGALMAY CHARITRA, UNKI BAAL LEELAYE ITNI MADHUR AUR CHITTAKARSHAK HE KI UNKA SRAVAN VA GAAN KARNE SE HRADAY PREMANAND ME SARABOR HO PRAFULLIT HOJATA HE KYONKI VAH SAKSHAT PURN BRAHM PARMATMA SHREE KRISHNA HI APNI ANUPAM LEELAO DVARA SABKO ANANDIT KARNE KE LIE AVATARIT HUE.

5. AKHAND RAAS LEELA JO SHREE KRISHNA JI NE DIVYA ROOP SE KI, US DIVYA AVEM MADHUR RASMAYI LEELA KA RAHASYA JANNE AUR SAMAJNE KA SAUBHAGYA BAHUT THODE LOGO KO PRAPT HOTA HE. BHAGVAN CHINMAY SVAROOP HE, AT: UNKI LEELA BHI CHINMAY HOTI HE. SACHCHIDANAND RASMAY SAMARAJYA KE JIS PARMONTAR STAR ME YAH LEELA HUA KARTI HE VAH TO VILAKSHAN EVAM APARAMPAR HE. USKA YATHARTH PRAKASH TO UNKI SATSVAROOPBHUTA ANAND ANG AAHLADINI SHAKTI SHREE RADHAJI (SHREE SHYAMAJI MAHARANI) EVAM PREMMAYI GOPIYA KE HRADAY ME HOTA HE.

6. SHREE KRISHNA PRANAMI DHARMA KE SIDDHANTO KE ANUSAR SHREE BAIKUNTH, GOLOKINATH, TATHA AKSHARATIT KA AAVESH IN SABKA NAAM IS PRITHVI PAR SHREE KRISHNA HI PADA KINTU INKI SHAKTI AUR LEELAO ME BADA ANTER HE JISE SAMAJKAR KI HUI UNKI UPASANA SARTHAK HOGI. PRANAMI DHARMA KE ANUYAYI AKSHARATIT BRAHM KO HI APNA IST MANTE HE.

Bhagvan Shree Krishna Arjun Ko Updesh Dete Hue Kahte He Ki -
Jab Jab Is Prithvi Par Aasuri Vrutti Ke Adham Abhimani Logo Ki Vruddhi Hoti He Aur unke Dvara Jab Dharma Ka Vinash Hokar Adharma Ka Abhyuday Hota he Tab Tab Me Avtaar Leta Hu. Is Ukti Ke Anusaar Samay Samay Par Vishnu Bhagvan Ansh Evam Kala Ke Roop Me Avtaar Lekar Sansaar Ke Kashto Ka Nivaran Karte He, Jiska Varnan Shastro Evam Shree Madbhagvat Me Chaubis Avtaaro Ke Kathanak Ke Roop me Upalabdha He. Kintu In Chaubis Actaaro Ka Varnan Karte Hue Shree Shuk Dev Muni Ikkis Avtaaro Ka To Spashta Roop Se Varnan Kar Sake, Lekin Shesh Teen Avtaaro -
(1). Shree Krishna Avtaar
(2). Buddhi Avtaar
(3). Kalki Avtaar
Ka varnan Sankshep Me Karke Hi Shant Ho Gae Karan Ki Ye Teeno Avtaar Vishnu Ke Na Hokar Shakshat Purn Brahm Svaroop Ke Aavirbhav Hone Ke He Evam Akhand Brahm Leela Se Sambandhit He. Inka Nirupan Karne Me Vahi Samarth He Jo In Leelao Ka Bhukt Bhogi Ho. Shukdev Muni Ne Shree Krishna Ji Ki Braj Leela Ka Mahattva Sanket Svaroop, Vishnu Bhagvan Evam Laxmiji Ke Drashtant Roop Me Varnan Kiya He. Vah Varnan Bhi Vicharniy He.

sadharantaya yah samja jata he ki vishnu bhagvan hi shree krishna svaroop me pragat hue jo asuro ka sanhar karne ke lie avtarit hue. kintu shree krishna ji ke pragat hone evam vishnu bhagvan ke avatarit hone ke rahasya ko sansaar ke jeev nahi samajate jabki sansaar ke palankarta vishnu bhagvan itna saamarthya rakhte he ki ek funk maar kar kans sarikhe kai asuro ka sanhar kar sakte he. fir yah kese mana jasakta he ki sakshat purnbrahm svaroop ko asuro ka sanhar karne ke lie aana pada. mahamati shree prannathji kahte he ki " YAH TEEN BRAHMAND HUE JO AB, ESE HUE NA HOSI KAB l "

purnbrahm aksharatit uttam purush jo sachchidanand svaroop he, unke sat ang akshar brahm ke ek palak me anant brahmand utapnna hote he aur nashta hote he. akshar brahm ki prakruti ka yah khel aviral roop se chalta rahata he. kintu " BINA KARAN KARYA NAHI HOY " ki ukti ke anusaar bina karya karan ke purnbrahm sansaar me avatarit nahi hote.

sachchidanand purnbrahm svaroop ke sad ang akshar brahm apni mul prakruti dvara baal krida svaroop anant brahmando ko ek kshan me utpanna kar nashta karna, yah unka baal svabhav he. ve nitya prati prat: aksharatit svaroop ka darshan karne jaya karte he aur un ka darshan kar vapis laut aate he. uhone keval aksharatit svaroop dham dhani ke alava kabhi bhi shyamaji evam angano ke darshan nahi kiye the. ek din dham dhani ki prerna se, akshar brahm ne shyamaji evam anant sakhiyo ke darshan kar lie. darshan karke vichar kiya ki - mere prabhu in anant angnao ke sath kis prakar ka anandanubhav karte he? kya me bhi un sukho ka anubhav kar sakta hu? he dhani ! muje apne anant sukho ka rasasvadan karaie.

isi prakar akhand paramdham ki un angno ne bhi apne dham dhani ke atirikt kabhi kisi any svaroop ko nahi dekha tha. pranpati ki prerna se un angano ne akshar bhram ko dekh kar dham dhani se pucha ki he prabhu ! humne aapke atirikt any kisi ko aaj tak nahi dekha, ye purush kaun he?, batane ki krupa kare. dham dhani ne kaha ki he angnao yah mera hi sat ang akshar he. yah apni prakruti se asatya, jad, dukh rupi sansaar ki utapatti evam vinash kshan bhar me karte he. inki anirvachaniy prakruti nana roop dharan kar apne dvara utapanna srushti ko apne hi ander nana prakar ke sukh dukho ka anubhav karati he.

sabhi angano ne milkar punah prashna kiya ki he dhanidhani ! aap to prem ke sagar he aur hum aapki angane he, us prem rupi sagar ki anant lahariya he. hum anant prem ke roop me aapko sada anandanubhav karati he. kya hamare prem se bhi badhakar inka dukh rupi sansaar he? dukh kise kahte he. asatya kya he evam jad kis prakar he, hume iska anubhav karaie.

dhamdhani ne apne hi ang shyamaji evam unke angmul anant angano dvara apne apne prem ki aadhikyata ka bakhan sunkar kaha ki he angano ! tumhe mere prem aur meri pratishtha (SAHEBI) ki sudh na hone se tum apne prem ko adhik batala rahi ho ki hum aapko apne prem dvara anandanubhav karati he. tumare dilo me mera diya prem hi to tarango ke roop me pragat hota he. jise tum ab tak na samaj saki. mere us prem ko pane par bhi akshar ke dvara rachit, asatya jad dukh rupi khel ko dekhne ki chah kar rahi ho. us juthe sansaar me jane par apne is prem ko bhul jaogi. at: us juthe khel ka anubhav karne ki chah mat karo.

pranpati ke is tarah dukh rupi sansaar ko dekhne ki ichah na karne ke lie kahne par bhi baar baar stri hath vash chah ki, ki he dhani ! hum to usi jhuthe sansaar ko dekhna chahti he jise aap hume bato me bahlakar dekhne ko mana kar rahe he. hume esa lag raha he ki aap hum sab ke prem me vashbhut hokar hume rok rahe he ki ye hume chhod jhuthe sansaar me ral mil jayegi. is tarah ke duragrah purn angano ke vachan sunkar dham dhani punah buddhi se yah sab soch rahi ho, yah buddhi us jhuthe sansaar me sath na degi. tum us brahmand me apne aapko bhul jaogi. sath sath muje bhi bhul kar jhuthe kutumb kabilo ko apna aatma sanbandhi samajne lagogi. isse bhi adhik apne mul ghar paramdham ko bhi bhul kar kshanik nashvar gharo ko apna ghar samjogi. usi me makdi ke saman jali gunth kar uljogi, kabhi bhi mul ghar ki yaad nahi aayegi. isliye me tumhe lagatar rok raha hu.

" MANE KIE HUMKO TEEN BER, TAB HUM MANGYA FER FER FER l
DHANI KAHE GHAR KI NA REHESI SUDH, BHULSI AAP NA REHESI E BUDH ll

TO MANE KARAT HE HUM, HUMKO BHI BHULOGE TUM l
TAB HUM FER DHANI SO KAHYA, KAHA KARSI HUM KO MAYA ll "
(shree prakash pr. 37 cho. 14 - 15)

dham dhani ke in vachano ko sunkar sabhi angane aapas me baat karne lagi ki dham dhani to apne prem ko sab se adhik dekhane ke lie hamare premagrah ko thukara rahe he. at: hum sab ek dil, ek ang hokar ek dusare ke gale me banhe dal kar baithe taki hum sabko koi alag na kar sake. ek sakhi ne dusari se kaha ki yadi me bhulne lagu, to tum sab mil muje sachet karna aur tum bhulne lagogi to hum tumhe savdhan kar degi. iske atirikt hum dham dhani ke charno se apan chit nahi hataegi. ti fir hume jhuthe sansaar ki maya kaise bhula sakegi. yah nirnay kar sabhi dham dhani se boli ki he dhani ! aap hume ek baar nahi sau baar bhi ajmaaish kar dekhle hum aapse alag nahi ho sakti.

akshar bhagvan evam angnaeo ke dil me is prakar ki chah utpanna karakar dhamdhani ne apne ishq evam paadshahi ki pahchan karane ke lie, akshar brahm ke dil par nidra svaroop tilasma ka aavaran daal diya. aavaran padte hi akshar bhagvan jis prakar jaagrat avastha me brahmand ki rachna karte the, svapna avastha me karne lage.

IT AKSHAR KO VILASYO MANN, PANCH TATVA CHAUDE BHAVAN l
YAME MAHAVISHNU MANN MANNTHE TRAIGUN, TAATHE THIR CHAR SAB UTAPNNA ll

YA VIDH UPAJYO SAB SANSAAR, DIKHLAVNE HUM KO VISTAAR l
JO AAGYA BHAI HUM PAR, TAB HUM JANYA GOKUL GHAR ll
(shree prakash Pr. 37 Cho. 18-19)

Svapnavat sansaar ki rachna hote hi paramdham se sabhi brahm angane apne aap ko brajmandal me avatarit dekhne lagi, jis tarah koi nidra me svapna dekhta he aur svapna me nana prakar ki samagri dikhai deti he usi tarah brahm angane baithi to dham dhani aksharatit ke charno me he, kintu purnbrham parmatma ke aavaran dalne par sabhi apne aapko braj vadhuo ke roop me dekhne lagi. Brajmandal me utapann hote hi sabhi ke mann me yahi chah rahi ki hum apne dhani se kab mile?

TUM HUMKO KHEL DIKHVAN KAAJ, HAMSO AAGE AAE SHREE RAJ l
                                                                             (shree prakash Pr. 18/6)

Jis tarah akhand paramdham me karya – karan utapann karake dhamdhani ne apni angano ko akshar brham ka khel dikhne bheja, usi tarah nitya golok dham jo akshar brham ke hi ant:karan me sthit he, vaha bhi akshar brham ne aksharatit dham ka anand dekhne ke nimitta karya karan utapann kara diya.

Golok dham me SHREE KRISHNA svaroop apni ardhangini radhika sahit sadhe teen karod sakhiyo ke sath nivas karte hue anand leela me nimagra rahte he. Ek din bhagvan shree krishna radhika ji se riskar bruja namak sakhi ke sadan me ja chhipe aur apne paarshad shree dama ko dvarpal ke roop me bruja sakhi ke dvar par baitha diya aur kaha ki yadi muje dhundhte hue radhika ji yaha aave, to unhe under na aane dena. Jaise hi radhika ji khojate khojate bruja sakhi ke ghar pahunchi aur unhe pata laga ki bhagvan under biraje he, ve under jane lagi kintu shree dama ne unhe under jane se rok diya. Radhika ji krodhit hokar shree dama se boli ki tune mera apmaan kiya he. Ab tu mrutyu lok me rakshas hokar janma lega. Kop tark sun shree krishnaji bruja sakhi sahit bahar aakar radhikaji ko kupit dekhte he. Bruja ke sath shree krishnaji ko dekhte hi radhikaji bruja se boli ki tere hi karan yah sab utapat hua he. Tu bhi mrutyu lok me yamuna nadi ke roop me hogi. Bruja bhi krodhit ho boli ki radhike ! tune bhagvan ke karya – karan ko na samaj kar shree dama aur muje sraap diya he. Tu bhi mrutyu lok me jakar bhagvan ke vieah me jalegi. Tab bhagvan ne sabhi ko sraap se mukt karne ke lie aashvasan diya ki me svayam aap sabko sraap se mukt karne ke liye avatarit hounga.

tadnusar shree dama mathura me agrasen raja ki rani pavanrekha ki kokh se utapann hue. janma lete hi kans, rakshas ke sansag dvara pavanrekha ke garbh hone ke karan rakshaso sarikha karya karne lage. sanyog se ek din kans parshuram ji ke aashram ja phuncha. vaha usne pashuram ji ko anek prakar ki baal kridao dvara prasann kar diya. pashuramji ne uske kautuk dekh kar aashirvad de diya ki ja, tuje trigunadi dev bhi parakram me parajeet na kar sakenge.

kans ek to udhdand tha hi, dusara parshuram ji ka aashirvad pakar aneko prakar se prithvi lok me atyachar karne laga. prithvi gaay ka roop dharan kar vishnu bhagvan ke paas jakar prarthna kar boli ki aap prithvi lok me avatarit hokar kans ke atyachar se muje karne ki krupa kare. vishnu bhagvan ne prithvi ko pratyutar diya ki yah kans golok dham ka shree dama namak dvarpal he. sraapvash kans ke roop me isne janma liya he. ise golok dham vasi shree krishnaji hi sanhar kar apne dham lejane me samarth he. at: sabhi devtao ko sath lekar vishnu bhagvan golok dham gaye aur vaha bhagvan se prithvi ka bhar haran karne ke lie prarthna ki. sab devo ki prarthna svikar kar golok dhamvashi shree krishna ne svayam avtaar lekar bhar haran karne ka vachan diya. vishnu bhagvan ko mathura nagari me avatarit hone ko kaha evam sabhi devo ko aadesh diya ki gokul me evam mathura me janma dharan karo. sabhi devo ne gokul me gopi evam gval baal ke roop me aakar janma dharan kiya.


Tuesday, May 15, 2012

Kya Shree Krishna Ne Shree Krishna par se Josh Khincha?

ha Shree Krishna Ne Shree Krishna par se Josh Khincha. sansaar me ek naam ke anek log dikhte he, shree krishna do he yah chopai shree bitak saheb me he jaha shree mukunddasji ke prati ramdas kehte hai - he bhav sinh ji inki bat na suno yah do do krishna bata rahe he.

E DOE KRISHNA BATAVAT JO KACHU NA SHASTRO ME l
INKA MUKH NA DEKHIE, CHARCHA KAISI INSE ll 17/53 shree bitak saheb

mahant ramdasji raja bhav sinh se kahte he ve brahmmuni shree mukunddasji se kisi prakar ki charcha na karo, yah shree krishna ko do do bata rahe he jo shastro me nahi bataya gaya maharaj hamari baat maanie to aap inka mukh bhi na dekhiye.

shree bitak sahab me shree mukunddasji do shree krishna batae he unme ek shree aksharatit shree krishna ne shree aksharbhram shree krishna se josh khincha. ab prashna banta he ki shree bitak sahab ne to do shree krishna batae he. yaha to tin shree krishna batae jarahe he. shree krishna ki tridha leela to khub suni he. dekho viddhavano ke apne mat he, shree aksharatit aur shree akshar brham dono ek hi svaroop he jiski chopai -

SARUP EK LEELA DOY

shree aksharatit aur shree aksharbrham dono ek hi svaroop he. dono ka naam shree krishna he. ha leela do he. "ek leela aksharatit ki dusari shree aksharbrahm ki."

NIJ LEELA BRAHM BAAL CHARITRA JAKI ICHAH MUL PRAKRUT l

aksharbrham ek pal me karodo brhamand banate aur mitate he arthaat kshar brahmand jaha ke log paarbrham parmatma shree aksharatit ko jante hi nahi yaha ka gyan ved kahe gaye aur usine brham ko NETI - NETI kaha he. vah navdha bhakti karte yaha ke jeevo ko bhagvan char prakar ki mukti dete he. char ved atharah puran, cha: shastra, ek sau aath upnisad aadi grantho ka gyan jeevo ke lie he yah nind me hone se ek paarbrham parmatma ko manne ka dava karte he, kintu vah anek mat sampradayo me bate hue he aur sab apne apne siddhanto ko srestha karte he jaise hamare yaha kuch ese hi shisya NIJANADI AUR PRANAMI do alag alag dharae dikhakar apni sresthta badharate he, islie kshar brhamand ko dvait bhumika kahte he yaha janma maram, paap punya aadi dvat he. yaha ke log karmo ka fal hi bhogte rehte he. aur kahte mahapralay ke bad sabe nirakar he. parmatma ko nirakar mante he.

shree aksharatit paarbrham ko do dekhna arthaat bhed gyan jahir karna yah kshar jagat ki rahni yahi nirakar he.

jaha tak brahmgyan ki baat he,jaha kaha ja raha ho ki shree krishna ki jaykara pahle isliye bolna chahie kyonki shree krishna pahle aae hai aur tisare brahmand me yani baad me shree prannath aae he. yah vichar shree parnadham me hui vidvat goshthi me katipay viddhvani ne rakhe.

NAAM SADHYA HE TO SADHAN PATIBRATA HAI l

shree paarbrahm parmatma paatshah he. kshar brhamand se lekar paramdham tak aapki sahebi he. aur aapne NIJNAAM SHREE KRISHNAJI jahir kiya sansaar janta he ki SHREE KRISHNA SHREE AKSHARATIT HE. iski hindu dharma grantho me khub mahima gayi he.

naam se utna hi janoge pahchanoge, jitna suna aur granto me padha. jaise shree raam ke bare me ramayan se ya shree krishna ko kitna janoge? jitna humne padha suna, shree madbhagvat sunne ke baad raja parikshit ko svarg hi mila hoga. yah shree krishna leela ko sunne ka fal he raja parikshit paramdham ya akhand me to pahunche nahi. inhe chhodo, trilok se koi nirakar na ulangh saka khair inhe bhi chhodo. ese karodo trilok pati jinke ek pal me bante aur mitte he, ese shree akharbrahm ko bhi sudh nahi parmatma ke anand vilas ki -

SHREE AKSHARATIT KE MAHAL ME PREM ISHK BARTAT l
SO SUDH AKSHAR KO NAHI KIN BIDH KHEL KARAT ll

PAARBRAHM LEELA RAS KA E JO GRANTH BHAGVAT l
JINKO SUNKE SAB SVARG KA SADHAN KARAT ll shree bitak sahab

yaha SHREE KRISHNA aur SHREE PRANNATH me jo bhed pragat ho raha he, vah bhed svarg aur paramdham ka he. nijanand sampraday ke sundarsath jinhe tartamwani mili he vah jante he svarg aue paramdham me kya fark hai, jabki NIJNAM ab jahir hua he ab matlab TARTAM jahir hone ke bad arthaat SHREE AKSHARATIT SHREE KRISHNA ab jahir hue hai. apne gyan ke aadhar par pehle aap shree krishna ki jay bolenge vah shree vishnuji vasudev ki kahi jaegi shree madbhagvat iski sakshi deti he shree krishna apne aapko vasudev hi kahte he. bahut dhyan dena sundarsathji apnate he duniya ise kaise samjegi? jagni me jinhe tartam nahi mila vah SHREE KRISHNA aur SHREE PRANNATH do manege jaise hamare yaha parvahi SHREE PRANNATH ko SHREE KRISHNA nahi mante. isse hamare gyan ki pahchan hoti he. pata lag jata he in mahashay ko tartam nahi mila yah paraprem lakshana bhakti samaj nahi sake.

thik he maan liya naam parmatma he to kya vah sadhan ho sakta he parmatma ko pane ka? spashtata nahi agar aap naam ko hi parmatma maan rahe ho to vah kaise sadhan hoga? sadhan to bhakti kahi jati he. navdha bhakti ya paraprem lakshana bhakti to tumari nisbat ya sambandh darshati he parmatma se. dikhto raha he naam me nisbat nahi navadha bhakti me parmatma ka naam lena matlab aap unhe prabhu kahte ho kintu paraprem lakshana bhakti me vah dhaniji ho jate he, islie tartam wani me kaha he - DHANI MERA PRABHU VISHVA KA l

spasta hojata he naam se pare vah sambandh he jo tumara parmatma se he yah tumara ankur he ki aap prabhu mante ho ya dhaniji. duniya PARBRAHM PARMATMA SHREE KRISHNA ko naam se pukarti he kyonki vah unke prabhu he kintu SUNDARSATHJI unhe SHREE PRANNATH kahte he to SHREE KRISHNA aur SHREE PRANNATH me fark aapke ankur ka pragat hota he. aap parmatma ko kis sadhan se pate ho yah aapki pehchan he. SHREE NIJANAND SAMPRADAY ki paddhatti me spasta aadesh he "PATIBRAT SADHAN MAAN" hum sab sundarsath isehi aatmsaat karte he. hum parmatma ko pati mante he aur hindu dharma granth me kahi nahi likha shree sitaji ne shree ramji ka naam lekar pukara ho, bharat desh me hindu parampara rahi he koi bhi patni apne pati ka naam nahi leti. to sathji hum apne pati ka naam kis aadhar pe pukare? isiliye brahm momin sundarsath ne hamesha se parbrahmparmatma ko SHREE PRANNATH pukara aur mana.

ab jiske paas jagrat gyan hoga vah samaj jaega SHREE PRANNATH se pahle SHREE KRISHNA ka hona kya kaha jaega. kyonki yah bhed he isliye vah navdha bhakti he. shree vishnuji ki bhakti chahiye to shree krishna ki jaykara pahle bolo. jagrat hojao hamesha se sundarsath SHREE PRANNATH pyare ki jay bolte rahe he kyonki yah nijanand sampraday ki paddhatti ke antergat he. brahmgyan ka chalan esa hi hota he. unhe parmatma ki pahchan hoti he.

(Mishan Advait Nijanand - Sundarsath Ka Jawab - Baba Sunil Dhami)
dharmaparayan pyare sundarsathji ko prem pranam

Thursday, May 10, 2012

मुक्तिपीठ श्री ५ पदमावतीपुरी धाम, पन्ना (मध्यप्रदेश)

पन्ना का प्राचीन नाम परना है। परना का अर्थ पर अर्थात अन्य और ना का अर्थ नहि होता है। अत: परना का सीधा अर्थ 'अन्य नही' अद्वैत है। श्री मुखवाणी और बीतक ग्रन्थो मे अद्वैत का भाव 'परमधाम' के लिये बार - बार आया है। जैसे :-

जो प्रदक्षिना निजधाम की, सातों सरुप श्री राज ।
सो सारे परना मिने, वास्ते सैयन के सुख काज ॥ 

अनेक ब्रह्मुनियो ने भी अपनी अपनी रचनाओ मे परना धाम को परमधाम कहा है। श्री क्रिष्ण प्रणामी धर्म के महान संत कवि मस्ताना जी ने भी परना मे ही परमधाम के दर्शन किये। वे अपने पंचक मे लिखते है:-

परना परमधाम देख, करिके परनाम देख ।
इश्क को आराम देख, सकल दु:ख भागे है ॥

महामति श्री प्राणनाथजी श्री बाईजूराज और ५००० सुन्दरसाथ को संग लेकर परना पहुंचे। तब पन्ना के महाराजा छत्रसाल जी ने श्री जी के अन्दर साक्षात श्री राजजी महाराज के और श्री बाईजू राजजी के अन्दर श्री श्यामा महारानी जी के दर्शन किये और कहा कि:-

जानि के मूल धनी अंगना अपनी, सो घर आये हमारे । 
श्री ठकुरानी जी सखियन सुधां, लेकर संग पधारे ॥ 

महामति श्री प्राणनाथजी परना पहुंचे कि शीघ्र ही उन्हे परमधाम के 'नूरी झण्डे' का स्मरण हो आया और उन्होने जागनी रास का नूरी झण्डा पन्ना मे फहरा कर मुक्तिपीठ श्री ५ पदमावतीपुरी धाम स्थापित किया। तब सभी सुन्दरसाथ ने परना मे परमधाम की अनुभूती कि और 'धाम के धनी की जय' का गगनभेदी नारा लगाया।
श्रीजी सुन्दरसाथ के स्वामी है। अत: उन्होने क्यामतनामा ग्रन्थ मे कहा है :-

इन देहुरी के सब चूमसी खाक, सिरदार मेहेरबान दिल पाक ।

परना में ही श्री मुखवाणी के खुलासा, खिलवत, परिक्रमा, सागर, सिनगार, मारफत सागर आदि ग्रन्थो का अवतरण हुआ। दिव्य परमधाम की गली गली की जानकारी सभी को हुई तथा तारतम ज्ञानरुपी नूरी झण्डे का दिव्य प्रकाश परमधाम तक पहुंचा। अत: कहा गया है:-

झण्डा पोहोंच्या अरस अजीम लग,
देखाए हक बडा अरस तमाम ।

श्री मुखवाणी मे जागनी रास लीला के अनेक दिव्य प्रसंगो का मंगलमय वर्णन है, जिसमे भी मुक्तिपीठ श्री ५ पदमावतीपुरी धाम की अलौकीक, अनुपम एवं असीम महिमा का पावन वर्णन मिलता है। स्वामी श्री लाल्दासजी ने भी अपनी बीतक मे परमधाम मे जो अष्ट प्रहर की दिव्य लीलाये होती है तद्नुसार ११ वर्ष तक पन्ना मे अष्ट प्रहर की लीलाओ का साक्षात अनुपम वर्णन कर पन्ना को परमधाम स्वरुप सिद्ध किया है।

मुक्तिपीठ श्री ५ पदमावती पूरी धाम की जागनी रास लीला नित्य और निरन्तर होती रहती है। अत: श्री क्रिष्ण प्रणामी धर्म मे पदमावती पुरी धाम का महत्त्व अनन्त, असीम, अपूर्व, अखंड और परम पावनकारी है। इस पुण्य धाम को ब्रह्मुनियो ने जागनी रास का मुलमिलावा कहा है। अत: इस पुरी का महत्व अन्य पुरिपो से अधिक है। शास्त्रो मे इसी पावन धाम को जगज्जीवो की मुक्ति का स्थन माना है। 

श्री तारतम मंत्र के अवरण और पूर्णब्रह्म श्री प्राणनाथजी के प्राकट्य मात्र से श्री ५ नवतनपुरी धाम स्वयं नित्य, अखंड, नवतन एवं असीम महिमामय और अपूर्व महिमा मंडित है।

जागनी लीला भूमी और विश्वशान्ति का परम पावन आदेश देने वाली पावन भूमी श्री ५  महामंगलपुरी धाम सुरत भी सदा सर्वदा आनन्द मंगलमयी और अनन्त महिमामयी भूमी के रुप मे अखंड, नित्य एवं परमपावन महिमामंडित है।

अखंड मुक्तिपीठ श्री ५ पदमावती पुरी धाम परना अनन्त, असीम, अपूर्व, नित्यधाम की शोभा से विभूषित है। सर्वप्रथम नवतनपुरी धाम मे निजानन्द संप्रदाय का बीज उदय हुआ। महामंगलपुरी धाम मे वह बीज बडे व्रुक्ष के रुप मे विकसित हुआ और मुक्तिपीठ श्री ५ पदमावतीपुरी धाम पन्ना मे इस व्रुक्ष मे अनंत शोभायुक्त मुक्तिदायक मीठे मीठे फल लगे। जिनका आस्वादन कर चराचर धन्य धन्य हुआ ।

श्री राजजी की लाडली सखीयो को श्री चरनों में बंटी भावसार प्रणामी का प्रेम प्रणाम
 

Wednesday, May 9, 2012

श्री ५ महामंगलपुरी धाम, सूरत (गुजरात)

मंगलपुरी महिमा बडी, है सबका गुरुद्वार ।
चले जगावन साथ को, श्री प्राणनाथ भरतार ॥

सदगुरु श्री देवचंद्रजी महाराज के धामगमन के पश्चात महामति श्री प्राणनाथजी ने सुन्दरसाथ की जागनी के लिए महान धर्म – अभियान प्रारम्भ किया। वे दीव बन्दर, ठ्तठानगर, बसरा, मसकत, अब्बासी, नलिया आदि स्थानो मे जागनी करते हुए अपने धर्मप्रिय सुन्दरसाथ को संग लेकर वि. सं. १७२९ अषाढ क्रिष्ण १४ को महामंगलपुरी धाम, सूरत पहुंचे। वहा १७ माह तक रहकर वे वैष्णवो और वेदान्तियो के साथ शास्त्रार्थ करके विजयी हुये। परिणाम स्वरुप भीम भट्ट, श्याम भट्ट, नवरंग स्वामी जैसे प्रणामी धर्म के महान वि्द्वान प्राप्त हुये। सूरत मे ही कलशवाणी के १२ प्रकरण और ५०४ चौपाइया अवतरित हुई, जिनके माध्यम से महामतिजी ने विश्व मे अखंड शान्ति स्थापित करने के लिए दावे के साथ महासंकल्प किये और विश्व महामंगल कीइ घोषणा की। तब से सूरत प्रणामी समाज मे 'श्री ५ महामंगलपुरी धाम’ के नाम से प्रसिद्ध है। उन्होने अपने संकल्प को चरितार्थ करने हेतु महाभियान प्रारम्भ किया। तब सूरत से ५०० धर्मप्राण सुन्दरसाथ सर्वस्व समर्पित करके श्रीजी के साथ निकल पदे। अत: सुन्दरसाथ के प्रति अप्रतिम प्रेम दर्शाते हुये वे कलसवाणी मे कहते है :-

हवे दु: ख न देऊंफूल पांखडी, सीतल द्रस्टे जोंऊ ।
सुख सागर मां झीलावी, विकार सघला धोऊं ॥ प्र. १२/२४

श्री ५ महामंगलपुरी धाम विश्व शांति के लिये स्वयं अदभुत, अनुपम एवं क्रान्तिकारी रहा है। जागनी अभियान का प्रमुख केन्द्र और सुन्दरसाथ मिलन का दिव्य प्रेरणा – स्रोत भी रहा है।
श्री महामति जी की महामंगलपुरी धाम मे हुई घोषणा को दोहराते हुए अपने बीतक ग्रन्थ मे स्वामी श्री लालदासजी कहते है:-

तब श्रीजी साहेबजी ने कहा, जो कोई लूला पांगला साथ ।
इन्द्रावती न छेडे तिनको, पहुंचावे पकड हाथ ॥ बी. प्र. ३१/२१

सदगुरु श्री देवचन्द्रजी महाराज का आदेश संदेश याद दिलाकर उन्होने बिहारीजी को कहा कि जाति – पांति के भेदो को समाज से दूर करके सबको एक सूत्र मे बांधना है और जाति विहीन समाज की रचना करना जरुरी है। जाति विहीन समाज – रचना का सरल मार्ग प्रस्तुत करते हुये वे कहते है:-

जित जो अंकुर निजधाम का, गिनिए ऊंच नीच न तित ।
ए राह श्री देवचन्द्रजी ए कही, आतम द्र्ष्टि कि इत ॥ बी. प्र. ३१/५९

जब श्रीजी ने बिहारीजी को सदगुरुजी के सिद्धांतो के मुताबिक धर्म – जागनी करने के लिए लिखा तो बिहारीजी आग बबूले हो गये और शीघ्र ही श्रीजी को धर्म और साथ मे से वहिष्क्रुत कर दिया। इसी समय सूरत के सुन्दरसाथ ने नि्र्णय लिया कि निजानन्द स्वामी अपनी मूल शक्तियो के साथ श्रीजी के दिल मे विराजमान है। इसलिये श्रीजी को यहा से विश्व जागनी का कार्य कर देना चाहिये। यह सोचकर सुन्दरसाथ ने श्रीजी के चरणो मे प्रार्थना की और भीमभाई के नेत्रुत्व मे श्रीजी को महामंगलपुरी धाम की गादी पर प्रतिष्ठित किया और श्रीजी के साथ श्री बाईजू राजजी को सिंहासन पर बिठाकर भीमभाई और सभी सुन्दरसाथ ने मिलकर “युगल स्वरुप" की आरती उतारी। इस परम पावन द्रुश्य को देखकर नवरंग स्वामी अत्यंत प्रभावित हुये। उसी समय उन्होने परमधाम मे विराजमान साक्षात श्री राजजी महाराज और श्री श्यामाजी महारानी जी के युगल स्वरुप के दर्शन किये और गदगद होकर नाचने लगे तथा उनके मुंह से वाणी नि: स्रुत हुई:-

श्री प्राणनाथ निजमूलपति, श्री मेहेराज सुनाम ।
तेज कुंवरि श्यामा जुगल को, पल पल करुं प्रणाम ॥ 

इस तरह महामंगलपुरी धाम मे भी परमधाम की आनन्दमयी लीलाए होती रही।
अत: श्री क्रिष्ण प्रणामी धर्म मे श्री ५ महामंगलपुरी धाम की महिमा और माहात्म्य अनुपम, अपूर्व, नित्य और महामंगलमय रही है।

प्राणाधार धर्मप्रेमी सुंदरसाथजी को मेरा कोती कोती प्रेम प्रणाम    
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